बैंक अब केवल CIBIL जैसे क्रेडिट स्कोर पर ही भरोसा क्यों नहीं कर रहे? इसकी वजह ये है कि ये स्कोर मुख्य रूप से पिछली वित्तीय आदतों को दर्शाते हैं। जानकारों की मानें तो CIBIL स्कोर एक 'रियरव्यू मिरर' (Rearview Mirror) की तरह हैं – ये बताते हैं कि आप कहाँ थे, लेकिन हमेशा यह नहीं बताते कि आप आर्थिक रूप से कहाँ जा रहे हैं।
सिर्फ स्कोर ही नहीं, और भी बहुत कुछ
सिर्फ स्कोर ही काफी नहीं। लेंडर (Lenders) अब अपने इंटरनल स्कोरकार्ड (Internal Scorecards) का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो क्रेडिट का इस्तेमाल, क्रेडिट हिस्ट्री की अवधि और आय की स्थिरता जैसे कई पहलुओं को तौलते हैं। इसलिए, अच्छे स्कोर वाले उधारकर्ताओं को भी रिजेक्ट किया जा सकता है, अगर अन्य संकेत बताते हैं कि वे बहुत ज़्यादा जोखिम वाले हैं। भारत के क्रेडिट रिस्क मॉडल (Credit Risk Models) ज़्यादा एडवांस हो रहे हैं और मुख्य स्कोर से आगे देख रहे हैं।
कैश फ्लो और कर्ज का बोझ सबसे अहम
उधारकर्ता की वर्तमान वित्तीय प्रबंधन क्षमता अब सबसे अहम है, बजाय इसके कि उसने अतीत में क्रेडिट का कैसे इस्तेमाल किया। लेंडर आय की स्थिरता, मासिक लोन भुगतान (EMIs), अनुमानित कैश फ्लो और कुल मिलाकर चुकाने की क्षमता का मूल्यांकन करते हैं। भले ही किसी का क्रेडिट स्कोर बहुत अच्छा हो, अगर उनकी वित्तीय स्थिति ज़्यादा तनावपूर्ण दिखती है, तो उन्हें लोन नहीं मिल सकता। 'थिन फाइल' (Thin Files) वाले लोगों के लिए एक चुनौती बनी हुई है, जिनकी क्रेडिट हिस्ट्री कम होती है, जिससे उनकी असली वित्तीय आदतों का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है।
एक पूरी फाइनेंशियल तस्वीर
लेंडर अब क्रेडिट स्कोर से कहीं ज़्यादा जानकारी का इस्तेमाल कर रहे हैं, और वे व्यापक डेटा स्रोतों (Data Sources) का सहारा ले रहे हैं। वे उधारकर्ता की असली वित्तीय आदतों को देखने के लिए बैंकिंग डेटा, GST रिकॉर्ड और ट्रांजेक्शन डिटेल्स (Transaction Details) को मिला रहे हैं। आपकी क्रेडिट हिस्ट्री कितनी लंबी और विविध है, यह भी महत्वपूर्ण है – सीमित, छोटी एक्टिविटी की तुलना में लगातार, लंबे समय तक क्रेडिट का उपयोग अक्सर ज़्यादा वित्तीय मजबूती दिखाता है। आखिर में, लोन की मंज़ूरी अक्सर आपके वर्तमान कर्ज के स्तरों पर निर्भर करती है, खासकर डेट-टू-इनकम रेशियो (Debt-to-Income Ratios), जो दिखाते हैं कि आप नए लोन के लिए कितनी क्षमता रखते हैं।
