RBI से बैंकों की गुहार: क्रेडिट बूम के लिए लिक्विडिटी नियमों में ढील दो!

BANKINGFINANCE
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
RBI से बैंकों की गुहार: क्रेडिट बूम के लिए लिक्विडिटी नियमों में ढील दो!
Overview

भारतीय बैंकों (Indian Banks) की तरफ से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से लिक्विडिटी (Liquidity) नियमों में ढील देने की मांग ज़ोर पकड़ रही है। दरअसल, बैंकों का क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) **13.1%** के शानदार आंकड़े को छू गया है, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ (Deposit Growth) **10.6%** पर ही सिमट गई है। इस बड़े फासले को पाटने के लिए बैंक ज़्यादा फंड्स तक पहुंच चाहते हैं।

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पैसे की तंगी और बढ़ती लागत (The Funding Squeeze)

भारतीय बैंक (Indian Banks) इस समय एक गंभीर फंड की किल्लत से गुजर रहे हैं, जहाँ लोन की मांग जमा राशि की वृद्धि से कहीं आगे निकल गई है। जनवरी 15 तक के आंकड़ों के अनुसार, क्रेडिट ग्रोथ सालाना 13.1% के ऊंचे स्तर पर है, जो इसी अवधि में बैंक डिपॉजिट में 10.6% की वृद्धि से काफी ज्यादा है। [cite: NEWS1]

इस असंतुलन के कारण बैंकों को महंगे शॉर्ट-टर्म फंड्स का सहारा लेना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, तीन महीने के सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CDs) पर 6.98% की दर से ब्याज मिल रहा है, जो सरकारी ट्रेजरी बिलों की तुलना में काफी अधिक है। [cite: NEWS1]

Nifty Bank इंडेक्स में भी इस फंड की बढ़ती लागत का असर दिखा, जो जनवरी 2026 में शुरुआती बढ़त के बाद सपाट रहा, क्योंकि निवेशकों को बढ़ते इंटरेस्ट एक्सपेंस (Interest Expenses) की चिंता सताने लगी। [cite: X2]

इसकी एक बड़ी वजह घरों के बचत पैटर्न में आया संरचनात्मक बदलाव माना जा रहा है। भारतीय परिवार अब ज़्यादा रिटर्न की चाहत में अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा इक्विटी मार्केट (Equity Markets) और अन्य निवेश विकल्पों में लगा रहे हैं, जिससे बैंकों के लिए पारंपरिक डिपॉजिट बेस सिकुड़ रहा है। [cite: X4]

रेगुलेटरी दांव-पेंच और रिस्क का गणित (Regulatory Levers and Risk Assessment)

भारत की आर्थिक रफ्तार को बनाए रखने और इस लिक्विडिटी क्रंच (Liquidity Crunch) से निपटने के लिए, जो फाइनेंशियल ईयर 2026 में 15% से भी ज़्यादा क्रेडिट ग्रोथ बनाए रख सकती है [cite: X7], बैंक RBI से कई महत्वपूर्ण रेगुलेटरी रियायतों की मांग कर रहे हैं।

उनकी मुख्य मांगों में से एक यह है कि उन्हें अपने अनिवार्य कैश रिजर्व रेशियो (CRR) का एक बड़ा हिस्सा लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (LCR) की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए इस्तेमाल करने की इजाज़त दी जाए। इस कदम से बड़ी मात्रा में पूंजी लोन देने के लिए उपलब्ध हो सकती है। [cite: NEWS1]

इसके अलावा, बैंक 1 अप्रैल से लागू होने वाले संशोधित लिक्विडिटी नियमों को पहले लागू करने की वकालत कर रहे हैं। यह नियम उन्हें कम सरकारी बॉन्ड (Government Bonds) रखने की अनुमति देगा। साथ ही, इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड की मिनिमम मैच्योरिटी पीरियड (Minimum Maturity Period) को कम करने की मांग भी है ताकि फंड जुटाना आसान हो सके। [cite: NEWS1]

हालांकि ये कदम फंडिंग की बाधाओं को दूर कर सकते हैं और लोन की लागत को कम कर सकते हैं, लेकिन ये अप्रत्याशित बाजार झटकों और सिस्टमैटिक स्ट्रेस (Systemic Stress) के खिलाफ पर्याप्त बफर बनाए रखने पर सवाल भी खड़े करते हैं। [cite: X6]

भारतीय बैंकिंग सेक्टर का वैल्यूएशन (Valuation), जिसका औसत P/E रेशियो अक्सर 15-20x के बीच रहता है [cite: X1], ग्रोथ पर बने बाजार के ऑप्टिमिज़्म (Optimism) को दर्शाता है। लेकिन अगर लिक्विडिटी की चिंताएं मार्जिन (Margin) को कम करती हैं या उधारदाताओं के बीच जोखिम से बचने की प्रवृत्ति (Risk Aversion) बढ़ाती हैं, तो इस ऑप्टिमिज़्म की परीक्षा हो सकती है। [cite: X5]

ऐतिहासिक मिसालें और भविष्य की राह (Historical Precedents and Future Paths)

ऐतिहासिक तौर पर, RBI ने सिस्टमैटिक लिक्विडिटी की चुनौतियों का सामना ओपन मार्केट ऑपरेशंस (Open Market Operations) और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (Marginal Standing Facility) में बदलावों के ज़रिए किया है, जिसमें अक्सर रिजर्व ज़रूरतों में अस्थायी ढील भी शामिल रही है। [cite: X3]

हालांकि, घरों की बचत के स्ट्रक्चरल बदलावों से प्रेरित वर्तमान परिदृश्य, एक अनूठी गतिशीलता प्रस्तुत करता है।

विश्लेषक इस बात को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं कि पर्याप्त डिपॉजिट जुटाए बिना मौजूदा क्रेडिट ग्रोथ की स्थिरता कितनी होगी, और चेतावनी दे रहे हैं कि अगर फंडिंग लागत बढ़ती रही तो मार्जिन में कमी आ सकती है। [cite: X5]

RBI के सामने एक महत्वपूर्ण निर्णय है: आर्थिक विस्तार को गति देने के लिए बैंकों को खुश करने में वित्तीय स्थिरता से समझौता करने का जोखिम है, जबकि सख्त नियम विकास की गति को धीमा कर सकते हैं।

केंद्रीय बैंक की प्रतिक्रिया को क्रेडिट उपलब्धता, इंटरबैंक लेंडिंग रेट्स (Interbank Lending Rates) और बैंकिंग सेक्टर के प्रति समग्र बाजार की भावना (Market Sentiment) पर इसके प्रभाव के लिए बारीकी से देखा जाएगा।

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