लोन की तूफानी रफ़्तार, डिपॉज़िट्स पिछड़ रहे
भारतीय बैंकों में लोन का वितरण (Credit Growth) बेतहाशा तेज़ हो गया है। पिछले कुछ हफ्तों में बैंकों का क्रेडिट 16% की रफ़्तार से बढ़ा है, जो दो हफ्ते पहले 15% था। वहीं, ग्राहकों की ओर से जमाओं (Deposits) की ग्रोथ महज़ 12.3% रही, जो पहले 12.2% थी।
इस बड़े अंतर की वजह से बैंकों का क्रेडिट-डिपॉजिट (C/D) रेश्यो अप्रैल के अंत तक 82.01% पर पहुंच गया है। यह भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के 60-80% के पसंदीदा दायरे से काफी ऊपर है। यह रेश्यो दिसंबर 2023 में ही 20 साल के रिकॉर्ड 80% को पार कर चुका था, और अब और बढ़ गया है।
फंडिंग पर दबाव और घटता मार्जिन
लोन की बढ़ती मांग और धीमी डिपॉज़िट ग्रोथ के कारण बैंकों पर फंडिंग का दबाव बढ़ रहा है। जब डिपॉज़िट्स की कमी होती है, तो बैंकों को महंगे होलसेल मार्केट से पैसा उठाना पड़ता है। इसके अलावा, करंट अकाउंट सेविंग्स अकाउंट (CASA) डिपॉज़िट्स, जो कि बैंकों के लिए सबसे सस्ते माने जाते हैं, उनमें भी गिरावट आई है। ये अब करीब 37.5% पर हैं, जो पहले लगभग 40% थे।
इस सबका सीधा असर बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर दिख रहा है, जो लाभप्रदता (Profitability) का एक अहम पैमाना है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि FY25 के लिए NIMs गिरकर 3.1% पर आ गए हैं, जो FY24 में 3.3% थे। प्राइवेट बैंक, जो आमतौर पर अपने डिपॉज़िट्स की तुलना में ज़्यादा लोन देते हैं, वे डिपॉज़िट्स जुटाने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं।
मज़बूत इकोनॉमी, पर चिंताएं बरकरार
हालांकि, भारत की अर्थव्यवस्था मज़बूत बनी हुई है। चालू वित्त वर्ष के लिए 6.9% की ग्रोथ का अनुमान है, और 2021 से औसतन 9-12% की ग्रोथ देखी गई है, जो लोन की मांग को बढ़ा रही है। लेकिन, तेज़ क्रेडिट ग्रोथ और बढ़ते C/D रेश्यो के साथ कई जोखिम जुड़े हैं।
बढ़ता क्रेडिट रिस्क और NPA की आशंका
इतिहास बताता है कि ऐसी स्थिति में वित्तीय अस्थिरता बढ़ सकती है और लोन की क्वालिटी बिगड़ सकती है। खासकर अनसिक्योर्ड पर्सनल लोन और माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSME) जैसे सेक्टर में क्रेडिट रिस्क बढ़ रहा है, और नए नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) में बढ़ोतरी की आशंका है। अगर C/D रेश्यो 85% को पार कर जाता है, तो RBI को हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।
साथ ही, ग्राहकों की आदतें भी बदल रही हैं। लोग अब सेविंग्स अकाउंट से पैसा निकालकर निवेश की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे बैंकों के लिए डिपॉज़िट जुटाना और मुश्किल हो गया है। सस्ते CASA डिपॉज़िट्स का दौर खत्म होता दिख रहा है, जिसके चलते बैंकों को अपनी डिपॉज़िट जुटाने की रणनीति बदलनी पड़ेगी।
बैंकों का भविष्य का नज़रिया
एक्सपर्ट्स का मानना है कि C/D रेश्यो धीरे-धीरे सामान्य होकर मार्च 2027 तक 79-80% के आसपास आ सकता है। ऐसे में, बैंकों के लिए डिपॉज़िट जुटाने की क्षमता एक बड़ी ताक़त साबित होगी। कुल मिलाकर, बैंकिंग सेक्टर धीमी ग्रोथ की ओर बढ़ रहा है, और इन बदलते आर्थिक और नियामक माहौल में बैंकों को अपनी नकदी, फंडिंग कॉस्ट और क्रेडिट रिस्क को कितनी अच्छी तरह मैनेज करते हैं, यह उनकी मज़बूती को परखेगा।
