Indian Banks: फंड की भारी किल्लत! डिपॉजिट से तेज़ी से बढ़ रहा लोन, बैंक हुए परेशान

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Indian Banks: फंड की भारी किल्लत! डिपॉजिट से तेज़ी से बढ़ रहा लोन, बैंक हुए परेशान
Overview

भारतीय बैंकों के लिए फंड की किल्लत बढ़ती जा रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि लोन (Credit) देने की रफ़्तार डिपॉजिट (Deposit) जुटाने की रफ़्तार से कहीं ज़्यादा तेज़ हो गई है। इस वजह से बैंकों का इनक्रीमेंटल क्रेडिट-डिपाजिट रेश्यो (Incremental Credit-Deposit Ratio) अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है।

इस गंभीर स्थिति के पीछे कई आंकड़े हैं जो इस फासले को साफ दिखाते हैं। पिछले फाइनेंशियल ईयर में, जनवरी 2026 तक, बैंकों के एग्रीगेट डिपॉजिट में 10.2% की बढ़ोतरी हुई, जबकि क्रेडिट ग्रोथ 12.2% की रफ़्तार से बढ़ा। पिछले एक साल की बात करें तो क्रेडिट ग्रोथ 14.6% पर पहुंच गया, जो पिछले 19 महीनों का सबसे ज़्यादा है, और यह डिपॉजिट ग्रोथ 12.5% से काफी तेज़ है। इसी वजह से, जनवरी 2026 तक, इनक्रीमेंटल क्रेडिट-डिपाजिट रेश्यो (Incremental C-D Ratio) लगभग 97% के करीब पहुंच गया, जबकि ओवरऑल रेश्यो 82.3% है। SBI जैसी बड़ी बैंकों ने भी अपने क्रेडिट ग्रोथ के अनुमान को बढ़ाकर 13-15% कर दिया है।

इस तेज़ क्रेडिट ग्रोथ का मतलब है कि बैंकों को अब लोन बांटने के लिए लोगों की सेविंग्स पर ज़्यादा निर्भर रहना पड़ रहा है। सिस्टम में भले ही कुल लिक्विडिटी (Liquidity) बनी हुई हो (12 फरवरी 2026 तक औसतन ₹3.03 लाख करोड़), लेकिन ज़्यादातर बैंक अब 'होलसेल फंडिंग' (Wholesale Funding) का सहारा ले रहे हैं। इसी का नतीजा है कि सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट्स (CDs) का आउटस्टैंडिंग अमाउंट रिकॉर्ड स्तर पर, करीब ₹5.3 से ₹5.4 ट्रिलियन पहुंच गया है। इन CDs पर मिलने वाली ब्याज दरें भी बढ़ गई हैं। एक साल की CD पर इंटरेस्ट 7.0% को पार कर गया है, जो पहले लगभग 6.65% था। यह साफ संकेत है कि बैंकों के लिए फंड जुटाने की लागत बढ़ रही है।

यह फासला बैंकों के लिए चिंता का सबब है। 'CASA रेश्यो' (Current Account Savings Account) जो मार्च 2022 में 42% था, वह गिरकर लगभग 37% रह गया है। इसका मतलब है कि बैंकों को अब सस्ते डिपॉजिट्स की जगह महंगे 'होलसेल डिपॉजिट्स' (CDs) और टर्म डिपॉजिट्स पर ज़्यादा निर्भर रहना पड़ रहा है। अगर इस ट्रेंड को मैनेज नहीं किया गया, तो यह बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) को दबा सकता है। HDFC Bank का क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेश्यो दिसंबर 2025 तिमाही में 98.7% था, जिसे वे अगले फाइनेंशियल ईयर में 92-96% तक लाने की कोशिश कर रहे हैं, जो इंडस्ट्री की बड़ी चुनौती को दिखाता है।

बाजार में इसका असर भी दिख रहा है। जहाँ SBI अपने ऑल-टाइम हाई ₹1153.85 (10 फरवरी 2026) पर पहुंचा, जिसका P/E रेश्यो करीब 13.03x और मार्केट कैप लगभग ₹1.106 लाख करोड़ था, वहीं HDFC Bank जैसी कुछ बड़ी बैंकों के शेयर नीचे जा रहे थे, जिन्हें एनालिस्ट्स ने 'Sell' रेटिंग दी। Axis Bank के CEO ने भी चेताया है कि सिंगल डिजिट या लो डबल डिजिट डिपॉजिट ग्रोथ, क्रेडिट ग्रोथ को बनाए रखने के लिए काफी नहीं होगी। भले ही GDP ग्रोथ 6.4% रहने का अनुमान है, लेकिन भविष्य में बैंकों की प्रॉफिटेबिलिटी काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कैसे फंड की लागत को कंट्रोल करते हैं और डिपॉजिट जुटाने का मैनेजमेंट करते हैं।

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