भारतीय बैंकों पर मंडराया संकट: लोन बढ़ रहे, जमा घट रही, फंडिंग की तंगी!

BANKINGFINANCE
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AuthorAditi Chauhan|Published at:
भारतीय बैंकों पर मंडराया संकट: लोन बढ़ रहे, जमा घट रही, फंडिंग की तंगी!
Overview

भारतीय बैंकों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है, क्योंकि लोन की मांग डिपॉजिट से कहीं ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रही है। अनुमान है कि FY27 तक क्रेडिट ग्रोथ हर साल डिपॉजिट ग्रोथ से **2-2.5%** ज़्यादा रहेगी। इसके साथ ही, कम लागत वाले सेविंग अकाउंट (CASA) डिपॉजिट के **37.9%** तक गिर जाने से बैंकों के मुनाफे पर दबाव बढ़ रहा है और फंड जुटाने की लागत तेज़ी से बढ़ रही है। एनालिस्ट्स मार्जिन पर लगातार दबाव को देखते हुए कमाई के अनुमान घटा रहे हैं।

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लोन और डिपॉजिट के बीच बढ़ती खाई

भारतीय बैंकिंग सेक्टर में लोन बांटने की रफ़्तार और डिपॉजिट जुटाने की रफ़्तार के बीच एक बड़ी खाई चौड़ी होती जा रही है। फाइनेंशियल ईयर 2027 तक के अनुमानों के मुताबिक, क्रेडिट ग्रोथ 12% से 14.5% के बीच रह सकती है, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ 10% से 12% रहने की उम्मीद है। इस असंतुलन ने एग्रीगेट क्रेडिट-डिपॉजिट (CD) रेशियो को रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचा दिया है, जो मार्च 2026 के मध्य तक लगभग 83% तक पहुंच गया था। यह ऊँचा अनुपात बताता है कि बैंक अब महंगे फंडिंग स्रोतों पर ज़्यादा निर्भर हो रहे हैं।

इस स्थिति को कम लागत वाले करेंट अकाउंट सेविंग्स अकाउंट (CASA) डिपॉजिट में आई भारी गिरावट ने और भी बदतर बना दिया है। दिसंबर 2025 की तिमाही में CASA डिपॉजिट घटकर 37.9% पर आ गए। सस्ते CASA डिपॉजिट से महंगे टर्म डिपॉजिट और होलसेल फंडिंग की ओर यह बदलाव बैंकों की लागत बढ़ा रहा है।

नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर ज़ोरदार दबाव

फंडिंग की यह तस्वीर बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर भारी दबाव डाल रही है। ज़्यादा फंडिंग लागत और धीमी NIM रिकवरी के चलते एनालिस्ट्स कमाई के अनुमानों में कटौती कर रहे हैं। दिसंबर 2025 तक, कुछ ही बैंकों ने साल-दर-साल NIM में सुधार दिखाया था। 1 अप्रैल, 2026 से लागू होने वाले नए लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (LCR) नियम लगभग ₹2.7-3 ट्रिलियन की लिक्विडिटी को फ्री करेंगे, लेकिन यह समस्या की जड़, यानी लागत की समस्या को हल नहीं करेगा। RBI के आंकड़े बताते हैं कि एक दशक से भी ज़्यादा समय से लोन, डिपॉजिट से लगातार तेज़ी से बढ़ रहे हैं, जिससे बैंकों को मांग पूरी करने के लिए महंगी फंडिंग ढूंढनी पड़ रही है।

महंगी फंडिंग पर निर्भरता

लोन और डिपॉजिट ग्रोथ के बीच लगातार बने रहने वाले अंतर का मतलब है कि भारतीय बैंकों की फंडिंग की संरचना में एक गहरी समस्या है। जैसे-जैसे डिपॉजिटर्स कहीं और बेहतर रिटर्न की तलाश में जा रहे हैं, CASA डिपॉजिट घट रहे हैं। ऐसे में बैंकों को ज़्यादा से ज़्यादा अस्थिर होलसेल फंडिंग और महंगे टर्म डिपॉजिट पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इससे फंड की लागत बढ़ जाती है, जो मुनाफे को नुकसान पहुंचाता है, खासकर उन बैंकों के लिए जिनकी रिटेल डिपॉजिट बेस कमज़ोर है। उदाहरण के लिए, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) का CASA रेशियो दिसंबर 2025 में लगभग 39.13% था, जबकि पूरे सिस्टम का औसत काफी कम हो गया है। HDFC बैंक जैसे बैंकों का CASA रेशियो लगभग 41% है, जो उन्हें कुछ राहत देता है। कुल मिलाकर, डिपॉजिट के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, जिससे फंडिंग की लागत बढ़ रही है और पूरे सेक्टर में NIMs पर दबाव पड़ रहा है। अप्रैल 2026 में इंडियन बैंक का P/E रेश्यो लगभग 11.07x था, जबकि निफ्टी बैंक इंडेक्स का P/E लगभग 14.98x था।

आगे का नज़रिया: मजबूत डिपॉजिट बेस वाले बैंक आगे निकलेंगे

FY27 के लिए अनुमानित 6.5%-7.2% की GDP ग्रोथ लोन की मांग को सहारा देगी। हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन की समस्याएं जैसी वैश्विक घटनाएं अस्थिरता पैदा कर रही हैं, जो ऊर्जा की कीमतों और कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित कर सकती हैं। एनालिस्ट्स का मानना है कि मजबूत रिटेल डिपॉजिट बेस, अच्छे लागत नियंत्रण और ठोस कैपिटल रिजर्व वाले बैंक इस मुश्किल फंडिंग माहौल में सबसे अच्छा प्रदर्शन करेंगे। होलसेल फंडिंग पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहने वाले या कमज़ोर डिपॉजिट बेस वाले बैंकों को मार्जिन कट और फंडिंग की कमी का ज़्यादा जोखिम उठाना पड़ेगा। यह स्थिति बताती है कि एनालिस्ट्स NIM के रुझानों पर नज़र बनाए रखेंगे और FY27 के लिए कमाई और प्राइस टारगेट को एडजस्ट करते रहेंगे, क्योंकि लोन-डिपॉजिट गैप बैंकों के मुनाफे को लगातार नुकसान पहुंचा रहा है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.