आर्बिट्राज का अनोखा खेल: बैंकों की कमाई कैसे बढ़ी?
भारतीय बैंकों के पास बंपर लिक्विडिटी ने एक अनोखा मौका पैदा कर दिया है। बैंक बाज़ार से कम ब्याज दर पर पैसे उधार ले रहे हैं और फिर उसे RBI के स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) के तहत 5% की दर पर जमा कर रहे हैं। सरकारी खर्च और अन्य वजहों से सिस्टम में आए इस भारी पैसे ने इंटरबैंक लेंडिंग रेट्स को पॉलिसी रेट्स से काफी नीचे धकेल दिया है।
मुनाफे का फासला: ₹5 लाख करोड़ RBI के पास जमा
बैंकों के लिए पैसे उधार लेने की लागत और 5% SDF दर के बीच एक बड़ा गैप बन गया है। मार्केट डेटा के मुताबिक, हाल ही में ट्राइ-पार्टी रेपो रेट, जो फंड जुटाने का एक अहम जरिया है, RBI की SDF दर से 34 बेसिस पॉइंट्स तक नीचे चला गया था, जबकि पिछले हफ्ते यह गैप 75 बेसिस पॉइंट्स तक था। इसी का नतीजा है कि बैंकों ने RBI के पास ₹5 लाख करोड़ की रिकॉर्ड राशि जमा कर दी है, जो सिर्फ दो हफ्ते पहले ₹1.4 लाख करोड़ थी। यह दिखाता है कि बैंक जोखिम भरे लोन देने की बजाय इस आसान और रिस्क-फ्री कमाई पर ज़ोर दे रहे हैं। इसी ढीली लिक्विडिटी को देखते हुए, फरवरी की शुरुआत में कमर्शियल बैंकों ने ₹1 ट्रिलियन से ज़्यादा के सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CDs) इश्यू किए हैं।
RBI की चाल: क्या है पॉलिसी ट्रांसमिशन का प्लान?
RBI लगातार कहता आया है कि वह लिक्विडिटी को मैनेज कर रहा है ताकि पॉलिसी रेट कट का फायदा नीचे तक पहुंचे। RBI ने लिक्विडिटी बढ़ाने के लिए ओपन मार्केट ऑपरेशन्स और फॉरेक्स स्वैप जैसे कई कदम उठाए हैं। एनालिस्ट्स का मानना है कि RBI शायद इस अतिरिक्त नकदी को सिस्टम में रहने दे रहा है, ताकि ओवरऑल फाइनेंशियल कंडीशन आसान हो और इकोनॉमिक एक्टिविटी को सपोर्ट मिले। लेकिन, यहाँ एक विरोधाभास है: एक तरफ RBI चाहता है कि ब्याज दरें कम हों, दूसरी तरफ बैंकों को इस आर्बिट्राज मौके से सुरक्षित रिटर्न की तरफ ज़्यादा झुकाव हो रहा है, बजाय इसके कि वे ज़्यादा लोन दें। मौजूदा समय में रेपो रेट 5.25% है, जबकि SDF रेट 5.00% है।
लोन का संकट: MSMEs के लिए उधार मुश्किल
सिस्टम में भरपूर पैसा होने के बावजूद, ज़रूरी सेक्टर्स तक क्रेडिट पहुँचाने में मुश्किलें बनी हुई हैं। भारत में क्रेडिट ग्रोथ, डिपॉजिट ग्रोथ से लगातार आगे रही है, जो फाइनेंशियल ईयर 25 में दो दशक के उच्चतम स्तर 79% पर पहुँच गई है। लेकिन, माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) को आज भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें भारी कोलैटरल की ज़रूरतें, जटिल कागजी कार्रवाई और फॉर्मल क्रेडिट तक सीमित पहुँच शामिल है। इसका नतीजा यह है कि MSMEs के लिए क्रेडिट की भारी कमी है, जो लगभग ₹45 ट्रिलियन तक पहुँच चुकी है। बैंक जहाँ MSMEs को ज़्यादा लोन देने की कोशिश कर रहे हैं और बेहतर ब्याज दरें भी दे रहे हैं, वहीं इन बिज़नेस के लिए स्ट्रक्चरल दिक्कतें अब भी बड़ी चिंता का विषय हैं।
पुरानी कहानी और मुनाफे का संतुलन
ऐतिहासिक रूप से, ज़्यादा लिक्विडिटी को मैनेज करने में बैंकों और पॉलिसी मेकर्स के लिए हमेशा एक 'ट्रेड-ऑफ' रहा है। रिसर्च बताती है कि जहाँ क्रेडिट फ्लो बढ़ाने से GDP ग्रोथ बढ़ सकती है, वहीं इससे बैंकों का मुनाफा थोड़ा कम हो सकता है। इसके उलट, मुनाफा बढ़ाने के चक्कर में लिक्विडिटी की कमी होने पर GDP ग्रोथ पर बुरा असर पड़ सकता है। मौजूदा आर्बिट्राज का हाल यह दिखाता है कि बैंक कम जोखिम वाले इस ट्रेड से मुनाफे को तरजीह दे रहे हैं, और शायद बड़े क्रेडिट ग्रोथ के मौके गँवा रहे हैं। उम्मीद है कि फाइनेंशियल ईयर 26 में बैंकों का मुनाफा थोड़ा कम हो सकता है, क्योंकि नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) घटने का अनुमान है, जो ब्याज दरों में कटौती और बढ़ी हुई क्रेडिट कॉस्ट से प्रभावित होगा।
चिंता का सबब: क्या यह आर्बिट्राज टिकाऊ है?
बैंकों का आर्बिट्राज पर निर्भर रहना, मजबूत क्रेडिट ग्रोथ और कैपिटल के कुशल इस्तेमाल की टिकाऊपन पर सवाल उठाता है। अगर बैंक सुरक्षित रिटर्न को प्राथमिकता देते रहे, तो यह ज़्यादा जोखिम वाले, पर इकोनॉमी के लिए ज़रूरी सेक्टर्स के लिए क्रेडिट राशनिंग का कारण बन सकता है। इसके अलावा, फरवरी के अंत तक टैक्स भुगतान की वजह से लिक्विडिटी में कमी आने की संभावना है और मार्च में भी यह तंगी बनी रह सकती है। MSME लेंडिंग की स्ट्रक्चरल दिक्कतें और बैंकों द्वारा लिक्विडिटी को प्रोडक्टिव एसेट्स की बजाय सुरक्षित जगहों पर लगाने का जोखिम अब भी बना हुआ है। RBI का पॉलिसी ट्रांसमिशन पर ज़ोर, अनजाने में इस आर्बिट्राज को बढ़ावा दे सकता है, जिससे मॉनेटरी पॉलिसी की इफेक्टिवनेस और असली इकोनॉमी के लिए क्रेडिट विस्तार के बीच एक नाज़ुक संतुलन बन जाएगा।