भारतीय बैंकिंग सिस्टम में नकदी का सरप्लस बढ़कर **₹10.5 लाख करोड़** के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इसे नियंत्रित करने और महंगाई पर लगाम लगाने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (**RBI**) ने **₹7 लाख करोड़** के रिवर्स रेपो ऑक्शन का ऐलान किया है।
भारतीय बैंकिंग सिस्टम में इस समय नकदी की भारी भरमार है, जिसका मुख्य कारण फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (FCNR) में हुआ बड़ा इनफ्लो है। हालिया स्वैप फैसिलिटी के तहत यह आंकड़ा $127.23 बिलियन तक पहुंच गया है। नकदी की इस अधिकता की वजह से बैंकों के लिए शॉर्ट-टर्म उधारी सस्ती हो गई है और सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) रेट्स अपने सालाना पीक से 100 बेसिस पॉइंट्स से ज्यादा गिर चुके हैं।
RBI का 'लिक्विडिटी एब्जॉर्प्शन' प्लान
बाजार में बढ़ती इस नकदी के कारण अस्थिरता न आए, इसके लिए RBI ने 7 सितंबर, 2026 को ₹7 लाख करोड़ का 30-दिवसीय वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑक्शन करने का फैसला किया है। इस कदम का सीधा मकसद सिस्टम से अतिरिक्त कैश को वापस खींचना है, ताकि शॉर्ट-टर्म ब्याज दरें पॉलिसी रेपो रेट से बहुत नीचे न गिरें और मॉनेटरी पॉलिसी का संतुलन बना रहे।
बैंक निवेशकों के लिए जोखिम और अवसर
बैंकों के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार जैसी है। एक ओर जहां फंड की लागत (Cost of funds) कम होने से राहत मिलती है, वहीं दूसरी ओर सिस्टम में बहुत ज्यादा नकदी होने पर बैंकों को लोन बांटने के लिए सही विकल्प ढूंढने में मुश्किल होती है। इससे मार्जिन पर दबाव (Margin Compression) बढ़ सकता है क्योंकि डिपॉजिट पर दिए जाने वाले ब्याज और लोन से होने वाली कमाई का अंतर कम हो सकता है।
इसके अलावा, लिक्विडिटी का यह सरप्लस महंगाई (Inflation) के लिए भी चिंता का विषय है। अगर इसे ठीक से मैनेज नहीं किया गया, तो आने वाले 12 महीनों में यह कोर इन्फ्लेशन में उछाल ला सकता है। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर हैं कि बैंक इस ऑक्शन में कितना पैसा पार्क करते हैं और क्या उनके अगले अर्निंग रिपोर्ट्स में मार्जिन पर किसी तरह का दबाव दिखता है।
