वित्तीय वर्ष **FY26** में भारत में बैंकिंग धोखाधड़ी की कुल वैल्यू बढ़कर **₹48,021 करोड़** हो गई है। राहत की बात यह है कि धोखाधड़ी के कुल मामलों में गिरावट आई है, लेकिन पब्लिक सेक्टर बैंकों पर इसका असर निवेशकों की चिंता बढ़ा सकता है।
आंकड़ों का गणित
FY26 में बैंकिंग धोखाधड़ी की कुल वैल्यू में पिछले साल के मुकाबले 46% का उछाल आया है। यह आंकड़ा पिछले साल ₹32,803 करोड़ था। हालांकि, संख्यात्मक रूप से देखें तो कुल फ्रॉड के मामले 23,722 से घटकर 10,114 रह गए हैं।
पुरानी फाइलें बनीं वजह
इस बड़ी उछाल की मुख्य वजह नई धोखाधड़ी नहीं, बल्कि पुरानी फाइलें हैं। बैंकों ने 314 ऐसे मामले रिपोर्ट किए हैं जो पिछले सालों से संबंधित थे, जिनकी वैल्यू ₹30,199 करोड़ है। रेगुलेटरी नियमों के तहत पुराने मामलों को शामिल करने से कुल आंकड़ा बढ़ा हुआ दिख रहा है।
लोन और डिजिटल पेमेंट का सच
आम तौर पर लोग डिजिटल पेमेंट फ्रॉड को लेकर डरे रहते हैं, लेकिन डेटा कुछ और ही कहता है। कुल फ्रॉड वैल्यू का 85% हिस्सा यानी ₹40,774 करोड़ केवल 'एडवांसेस' या लोन कैटेगरी से आया है। दूसरी ओर, डिजिटल पेमेंट और कार्ड से संबंधित फ्रॉड के मामले 13,332 से गिरकर सिर्फ 293 रह गए हैं।
बैंकों के मुनाफे पर असर
पब्लिक सेक्टर बैंकों की स्थिति सबसे संवेदनशील है, जहां कुल फ्रॉड वैल्यू का 74% यानी ₹35,709 करोड़ का हिस्सा दर्ज हुआ है। जब लोन बुक में फ्रॉड बढ़ता है, तो बैंकों को इसके लिए भारी प्रोविजनिंग (Provisioning) करनी पड़ती है। इससे बैंक का सीधा मुनाफा कम होता है और लाभांश (Dividend) पर भी असर पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए टेक-अवे
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार बैंकों पर सख्त है। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि बैंक अपने प्रोविजन कवरेज रेशियो और एसेट क्वालिटी को कैसे मैनेज करते हैं। आगामी तिमाही नतीजों में इन पुराने मामलों की सफाई से मुनाफे पर पड़ने वाले प्रभाव पर नजर रखना जरूरी होगा।
