आर्थिक मोर्चे पर भारत की रणनीति: दबाव और विकास के बीच संतुलन
वैश्विक अनिश्चितताओं और मुद्रा बाजारों में उतार-चढ़ाव के बीच, भारतीय अधिकारी एक नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। एक तरफ जहां रुपये पर दबाव है, वहीं दूसरी तरफ सरकार विकास को गति देने और वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) बढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण कदम उठा रही है।
रुपये का दबाव और विदेशी निवेश (FDI)
जनवरी 2026 के अंत तक, भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92 के स्तर को छू गया था। इस गिरावट की वजहें, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का पैसा निकालना और डॉलर की मजबूत मांग बताई जा रही है। सिर्फ जनवरी 2026 में ही FPIs ने ₹35,962 करोड़ से ज्यादा की बिकवाली की। हालांकि, अधिकारी राहत की बात यह बता रहे हैं कि वित्तीय वर्ष 2024-25 में एफडीआई का कुल इनफ्लो $81.0 बिलियन रहा, जो काफी मजबूत है। आर्थिक मामलों के सचिव, अनुराधा ठाकुर ने साफ किया है कि पोर्टफोलियो में यह अस्थिरता घरेलू कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि वैश्विक अनिश्चितताओं का नतीजा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) फॉरेक्स मार्केट में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप कर रहा है, ताकि रुपये को 90 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे जाने से रोका जा सके। कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए फायदेमंद है, लेकिन डॉलर-नॉमिनेटेड (Dollar-denominated) विदेशी कर्ज का बोझ बढ़ा सकता है।
वित्तीय अनुशासन और विकास का लक्ष्य
सरकार वित्तीय अनुशासन बनाए रखने पर भी ध्यान केंद्रित कर रही है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) को जीडीपी के 4.3% पर लाने का लक्ष्य है, जो FY26 के अनुमानित 4.4% से थोड़ा बेहतर है। सरकार वित्तीय वर्ष 2027 तक केंद्र सरकार के कर्ज-से-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP Ratio) को 55.6% तक लाने की योजना बना रही है। इन सबके बीच, वित्तीय वर्ष 2026 में अर्थव्यवस्था की वास्तविक जीडीपी ग्रोथ 7.4% रहने का अनुमान है। वित्तीय वर्ष 2026 की पहली छमाही में करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) सुधरकर 0.8% हो गया था।
वित्तीय समावेशन और बैंकिंग रिफॉर्म्स
देश के करीब 300-350 मिलियन लोगों तक अभी भी औपचारिक क्रेडिट (Formal Credit) की पहुंच नहीं है। इस अंतर को पाटने के लिए, सरकार 'विकसित भारत' के लक्ष्य के तहत क्रेडिट ग्रोथ को वर्तमान 12% से बढ़ाकर 15% से अधिक करने की दिशा में काम कर रही है। इसके साथ ही, बॉन्ड मार्केट को मजबूत करने और आंशिक क्रेडिट गारंटी (Partial Credit Guarantees) जैसी पहलें भी की जा रही हैं। पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSBs) में एफडीआई की सीमा 49% तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर भी चर्चा चल रही है। पीएसबी वित्तीय वर्ष 2027 में ₹40,000–45,000 करोड़ की पूंजी जुटाने की उम्मीद कर रहे हैं। बैंकिंग सेक्टर में सुधारों की अगली कड़ी तय करने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति बनाने का भी प्रस्ताव है।
निर्यात क्षमता और सेक्टर-विशिष्ट ग्रोथ
कमजोर रुपया और प्रतिस्पर्धी श्रम लागत (Competitive Labor Costs) भारत के निर्यात को बढ़ावा दे रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2025 में भारत का कुल निर्यात $825.3 बिलियन तक पहुंच गया। सरकार आवश्यक आयात पर निर्भरता कम करने के लिए भी काम कर रही है। नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) भी वित्तीय इकोसिस्टम में अपनी भूमिका का विस्तार करेंगी।