भारत का एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज (ABS) मार्केट पिछले फाइनेंशियल ईयर में रिकॉर्ड ₹1.53 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है। इसमें विदेशी बैंकों की भागीदारी 35% रही। यह भारतीय नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के लिए लोन बुक बढ़ाने का एक अहम जरिया बन गया है।
क्या हुआ?
भारत के एसेट-बैक्ड सिक्योरिटीज (ABS) मार्केट ने पिछले फाइनेंशियल ईयर में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इस दौरान कुल इश्यूएंस (Issuance) ₹1.53 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह एक ऐसा वित्तीय जरिया है, जिसमें पर्सनल लोन, व्हीकल लोन या गोल्ड लोन जैसे विभिन्न लोन को बंडल करके इन्वेस्टमेंट सर्टिफिकेट के रूप में बेचा जाता है। अब विदेशी बैंकों की इसमें दिलचस्पी बढ़ी है। Barclays, Citigroup, JPMorgan और Standard Chartered जैसे ग्लोबल बैंक अब कुल इश्यूएंस का करीब 35% हिस्सा खरीद रहे हैं। CRISIL Ratings के अनुसार, यह पिछले दो सालों में 28% से 30% की हिस्सेदारी से एक महत्वपूर्ण बढ़ोतरी है।
बिजनेस के लिए क्यों अहम?
भारतीय नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के लिए यह एक बड़ी डेवलपमेंट है। इन लोन पूल्स (Loan Pools) को ग्लोबल निवेशकों को बेचकर, NBFCs अपने फंसे हुए पैसे को वापस पा सकती हैं। इस लिक्विडिटी (Liquidity) से वे ग्राहकों को और ज़्यादा लोन दे पाएंगी, बिना मूल लोन की राशि वापस आने का इंतज़ार किए।
ग्लोबल बैंकों को इस मार्केट में कई कारणों से आकर्षण दिख रहा है। आकर्षक यील्ड (Yield) - जो वर्तमान में AAA से A रेटेड सिक्योरिटीज के लिए 7.3% से 11.5% के बीच है - के अलावा, ये निवेश उन्हें स्थानीय रेगुलेटरी ज़रूरतों को पूरा करने में भी मदद करते हैं, जैसे कि प्रायोरिटी-सेक्टर लेंडिंग (Priority-Sector Lending) के नियम। साथ ही, इन ग्लोबल संस्थानों के लिए, सिक्योर्ड लोन (Securitized Loans) रखना भारतीय मार्केट में सीधे लोन देने की तुलना में ज़्यादा कैपिटल-एफिशिएंट (Capital-Efficient) हो सकता है।
क्रेडिट इकोसिस्टम पर असर
यह ट्रेंड भारतीय लेंडर्स के लिए फंडिग गैप (Funding Gap) को भरने में मदद करता है। जब Reliance Group कंपनियों द्वारा पिछले सितंबर में ₹210 अरब जुटाए जाने जैसे बड़े डील्स होते हैं, तो यह दिखाता है कि यह मैकेनिज्म बड़े पैमाने पर काम करता है। यह एक ऐसा साइकिल बनाता है जहाँ NBFCs रिटेल क्रेडिट ग्रोथ को फंड करना जारी रख सकती हैं क्योंकि उन्हें अपने लोन पोर्टफोलियो के लिए एक तैयार खरीदार मिल जाता है। हालांकि, इस मार्केट की सफलता काफी हद तक अंडरलाइंग लोन (Underlying Loans) की क्वालिटी पर निर्भर करती है। अगर इन सिक्योरिटीज में बंडल किए गए रिटेल लोन के बॉरोअर्स (Borrowers) रीपेमेंट में स्ट्रगल करते हैं, तो सिक्योरिटीज का वैल्यू प्रभावित हो सकता है।
जोखिम और ध्यान रखने योग्य बातें
ABS मार्केट की ग्रोथ लिक्विडिटी तो बढ़ाती है, लेकिन सावधानी की ज़रूरत भी पैदा करती है। निवेशकों के लिए मुख्य जोखिम अंडरलाइंग लोन पूल्स की क्वालिटी का है। अगर आर्थिक हालात टाइट होते हैं और रिटेल बॉरोअर्स अपने पेमेंट्स पर डिफॉल्ट करते हैं, तो इन सिक्योर्ड प्रोडक्ट्स से होने वाली आय पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, भारतीय ABS मार्केट बढ़ रहा है, लेकिन यह चीन जैसी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अभी भी छोटा है। निवेशकों को बंडल किए जा रहे रिटेल लोन की क्रेडिट क्वालिटी की स्थिरता पर ध्यान देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विस्तार के कारण अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स (Underwriting Standards) से समझौता न हो।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आगे चलकर, फाइनेंशियल सेक्टर के निवेशकों को सिक्योराटाइजेशन डील्स (Securitization Deals) के वॉल्यूम पर नज़र रखनी चाहिए, क्योंकि यह NBFCs के हेल्थ और फंडिंग फ्लेक्सिबिलिटी को दर्शाता है। इंटरेस्ट रेट ट्रेंड्स (Interest Rate Trends) को देखना भी महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि ये इन सिक्योरिटीज द्वारा पेश किए जाने वाले कूपन रेट्स (Coupon Rates) के आकर्षण को प्रभावित करते हैं। अंत में, सिक्योराटाइजेशन नॉर्म्स (Securitization Norms) या प्रायोरिटी-सेक्टर लेंडिंग रिक्वायरमेंट्स (Priority-Sector Lending Requirements) में किसी भी बदलाव पर रेगुलेटरी कमेंट्री (Regulatory Commentary) एक प्रमुख कारक होगा, क्योंकि ये भारतीय मार्केट में ग्लोबल बैंकों की भागीदारी को सीधे प्रभावित करते हैं।
