भारत के **10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड** की यील्ड बढ़कर **7.48%** पर पहुंच गई है, जिससे अमेरिका के साथ इसका अंतर **251 बेसिस पॉइंट्स** हो गया है। हालांकि यह विदेशी निवेश के लिए अच्छा अवसर हो सकता है, लेकिन हेजिंग की लागत और करेंसी रिस्क के कारण निवेशक अभी फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।
गैप बढ़ने के बावजूद क्यों नहीं आ रहा पैसा?
आमतौर पर जब भारतीय और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के बीच का अंतर बढ़ता है, तो विदेशी निवेशक 'कैरी ट्रेड' (carry trade) के जरिए भारत की ओर आकर्षित होते हैं। लेकिन इस बार स्थिति थोड़ी जटिल है। विदेशी निवेशकों के लिए केवल यील्ड ही मायने नहीं रखती, उन्हें करेंसी के जोखिम को भी मैनेज करना पड़ता है। अगर रुपया डॉलर के मुकाबले गिरता है, तो यील्ड से होने वाली सारी कमाई धुल सकती है। इस रिस्क से बचने के लिए निवेशक 'हेजिंग' (hedging) का सहारा लेते हैं, जिसकी लागत फिलहाल काफी ऊंची है। नतीजतन, हाथ में आने वाला वास्तविक मुनाफा (effective return) उम्मीद से कम रह जाता है।
क्यों बढ़ रहा है बॉन्ड यील्ड पर दबाव?
यील्ड बढ़ने के पीछे ग्लोबल कारणों के साथ-साथ क्रूड ऑयल की कीमतों का भी बड़ा हाथ है। भारत कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक है, और तेल की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर देश में महंगाई बढ़ाता है। बाजार को डर है कि महंगाई को काबू में रखने के लिए Reserve Bank of India (RBI) ब्याज दरों (Repo Rate) को लंबे समय तक ऊंचा रख सकता है। इसी आशंका की वजह से बॉन्ड डीलर्स ज्यादा रिटर्न की मांग कर रहे हैं।
डेट म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए संकेत
अगर आप डेट म्यूचुअल फंड्स में निवेशित हैं, तो यह खबर आपके लिए महत्वपूर्ण है। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो पुराने बॉन्ड्स की कीमतें गिर जाती हैं। इसका सीधा असर डेट फंड्स के पोर्टफोलियो वैल्यू पर पड़ता है। फिलहाल मार्केट की नजर 7.45% के लेवल पर टिकी है। अगर यील्ड 7.50% के पार निकलती है, तो बॉन्ड बाजार में हलचल और बढ़ सकती है। अब निवेशकों की नजरें क्रूड ऑयल के ट्रेंड और RBI के अगले फैसलों पर टिकी हैं।
