भारत में को-ब्रांडेड क्रेडिट कार्ड (Co-branded Credit Cards) अब सिर्फ ट्रैवल या लॉयल्टी पॉइंट्स तक सीमित नहीं रहेंगे। ये कार्ड अब रोज़मर्रा के खर्चों, जैसे ग्रोसरी, डाइनिंग और UPI ट्रांजैक्शन को भी कवर करेंगे। इंडस्ट्री के आंकड़े बताते हैं कि अगले पांच सालों में नए कार्ड इश्यूएंस (New Card Issuances) में इनका हिस्सा **25-30%** तक पहुंच सकता है।
पार्टनरशिप से बढ़ेगी कार्ड की यूटिलिटी
IndiGo और Axis Bank के नए को-ब्रांडेड कार्ड इसी बदलाव का एक बड़ा उदाहरण हैं। अब ये कार्ड सिर्फ फ्लाइट टिकटों पर ही नहीं, बल्कि नॉन-ट्रैवल खर्चों पर भी शानदार रिवॉर्ड्स दे रहे हैं। इससे ब्रांड्स ग्राहकों की रोज़मर्रा की जिंदगी में अपनी उपस्थिति बनाए रख सकेंगे। यह मॉडल इंटरनेशनल लेवल पर भी सफल रहा है, जैसे Delta Air Lines और American Express की पार्टनरशिप। इन पार्टनरशिप में, एयरलाइन या रिटेल ब्रांड कस्टमर बेस और एंगेजमेंट देता है, जबकि बैंक क्रेडिट इंफ्रास्ट्रक्चर, रेगुलेटरी कंप्लायंस और डेटा प्रोसेसिंग की जिम्मेदारी संभालता है।
डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा ग्रोथ का इंजन
बैंकों के लिए इन पार्टनरशिप का सबसे बड़ा फायदा डेटा एनालिटिक्स (Data Analytics) है। खर्चों की जानकारी से ग्राहकों के लिए पर्सनलाइज्ड ऑफर्स तैयार किए जा सकते हैं, जिससे उन्हें बेहतर कंज्यूमर प्रोफाइल बनाने में मदद मिलती है। यह लेवल की पर्सनलाइजेशन जनरल-पर्पस कार्ड्स के साथ मुश्किल होती है। जैसे-जैसे ये प्रोग्राम मैच्योर होंगे, मल्टीपल कैटेगरीज में हाई-इंटेंट कंज्यूमर बिहेवियर का विश्लेषण करना, क्रेडिट रिस्क कम करने और कस्टमर लाइफटाइम वैल्यू बढ़ाने वाले लेंडर्स के लिए एक बड़ा एडवांटेज बन जाएगा।
मार्केट आउटलुक और कंसंट्रेशन रिस्क
फिलहाल, को-ब्रांडेड क्रेडिट कार्ड भारत के कुल क्रेडिट कार्ड बेस का लगभग 17% हैं और कुल खर्चों में इनका हिस्सा करीब 18% है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अगले पांच सालों में नए कार्ड इश्यूएंस में इनका हिस्सा बढ़कर 25-30% हो जाएगा। कई ग्राहकों के लिए, ये पार्टनरशिप फॉर्मल क्रेडिट में एंट्री पॉइंट का काम करती हैं, खासकर जब कार्ड किसी भरोसेमंद रिटेल या ट्रैवल ब्रांड से जुड़ा हो।
हालांकि, इस स्ट्रैटेजी में कुछ चुनौतियाँ भी हैं। कई फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस को अभी भी लेगेसी कोर बैंकिंग सिस्टम से जूझना पड़ रहा है, जिससे नए पार्टनर प्रोग्राम्स का टेक्निकल इंटीग्रेशन धीमा और जटिल हो सकता है। निवेशकों को सेक्टर कंसंट्रेशन (Sector Concentration) का जोखिम भी ध्यान में रखना चाहिए। जो लेंडर्स किसी एक पार्टनरशिप या इंडस्ट्री पर बहुत ज्यादा फोकस करते हैं, उन्हें उस विशेष सेक्टर में मंदी या खर्च में कमी आने पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके अलावा, ट्रांसपेरेंसी (Transparency) भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर है। जैसे-जैसे रिवॉर्ड स्ट्रक्चर्स और जटिल होते जाएंगे, वे प्रोग्राम जो टर्म्स को स्पष्ट रूप से कम्युनिकेट नहीं करते, उन्हें कॉम्पिटिटिव मार्केट में यूजर्स को बनाए रखने में मुश्किल होगी। भविष्य में, इन प्रोग्राम्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बैंक टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत और सेक्टर-स्पेसिफिक डिमांड में उतार-चढ़ाव को मैनेज करते हुए कितने सरल और समझने योग्य रिवॉर्ड मॉडल बनाए रख पाते हैं।
