प्राइवेट इक्विटी में बड़ा बदलाव: बड़े फर्मों को छोड़कर प्रोफेशनल बन रहे 'इंडिपेंडेंट स्पॉन्सर'

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
प्राइवेट इक्विटी में बड़ा बदलाव: बड़े फर्मों को छोड़कर प्रोफेशनल बन रहे 'इंडिपेंडेंट स्पॉन्सर'

बड़े प्राइवेट इक्विटी (Private Equity) फर्मों में काम करने वाले अनुभवी फिनटेक प्रोफेशनल्स अब अपनी राह बना रहे हैं। वे बड़ी फर्मों को छोड़कर 'इंडिपेंडेंट स्पॉन्सर' के तौर पर छोटे और मध्यम आकार की कंपनियों में निवेश कर रहे हैं।

Detailed Coverage

क्यों छोड़ रहे हैं बड़े फर्म?

ये दिग्गज फाइनेंसर बड़े फंड स्ट्रक्चर्स से हटकर इंडिपेंडेंट वेंचर्स शुरू कर रहे हैं। इनका मुख्य फोकस उन छोटी कंपनियों को एक्वायर करना है, जिन्हें बड़ी फर्म्स अक्सर अनदेखा कर देती हैं। यह मॉडल डील-मेकर्स (Deal Makers) को ज़्यादा ऑटोनॉमी (Autonomy) देता है, साथ ही निवेशकों को कम फीस पर जल्दी रिटर्न (Returns) दिलाने का वादा करता है।

इंडिपेंडेंट डील-मेकिंग का उभार

Carlyle Group जैसी बड़ी फर्मों के पूर्व लीडर्स अब अपने प्लेटफॉर्म लॉन्च कर रहे हैं। इसकी वजह है ज़्यादा आज़ादी और डील-मेकिंग के फंडामेंटल पर लौटने की इच्छा। पारंपरिक मल्टी-ईयर फंड (Multi-year Fund) के दबाव से बाहर निकलकर, ये स्पॉन्सर किसी एक एसेट पर फोकस कर सकते हैं, बजाए इसके कि तय समय-सीमा में भारी-भरकम कैपिटल (Capital) डिप्लॉय करने का दबाव हो। KKR के को-फाउंडर हेनरी क्रैविस (Henry Kravis) जैसे दिग्गजों ने भी बड़ी फर्मों के मैनेजमेंट की जटिलताओं के बजाय छोटी कंपनियों को बढ़ाने पर जोर देने की बात कही है।

निवेशकों के लिए सस्ता और बेहतर विकल्प?

पारंपरिक प्राइवेट इक्विटी फंड्स अक्सर हर साल 2% की मैनेजमेंट फीस लेते हैं, चाहे डील सफल हो या न हो। इसके उलट, इंडिपेंडेंट स्पॉन्सर अक्सर ये फिक्स्ड मैनेजमेंट फीस नहीं लेते। वे ट्रांजैक्शन फीस (Transaction Fees) और परफॉर्मेंस-बेस्ड कैरिड इंटरेस्ट (Carried Interest) पर निर्भर करते हैं। यानी, जब वैल्यू बनती है, तभी स्पॉन्सर कमाता है। यह मॉडल फैमिली ऑफिस (Family Offices) और प्राइवेट निवेशकों को लुभा रहा है, जो ज़्यादा ट्रांसपेरेंट (Transparent) और परफॉर्मेंस-ओरिएंटेड (Performance-Oriented) इन्वेस्टमेंट व्हीकल्स (Investment Vehicles) चाहते हैं।

लोअर-मिडिल मार्केट पर फोकस

इंडिपेंडेंट स्पॉन्सर्स का मार्केट 2019 से लगभग दोगुना होकर अब करीब 1,400 फर्म्स तक पहुंच गया है। ये फर्म्स आमतौर पर $2 मिलियन से $10 मिलियन तक की एडजस्टेड अर्निंग्स (Adjusted Earnings) वाली कंपनियों को टारगेट करती हैं। इस सेगमेंट में सबसे बड़ा फायदा वैल्यूएशन गैप (Valuation Gap) है। जहाँ बड़े बायआउट्स (Buyouts) अक्सर 11 गुना से ज़्यादा अर्निंग्स पर होते हैं, वहीं लोअर-मिडिल मार्केट में डील 4 से 6 गुना अर्निंग्स पर मिल जाती है।

इंडिपेंडेंट मॉडल में जोखिम

लोअर-मिडिल मार्केट में कम एंट्री वैल्यूएशन (Entry Valuations) के बावजूद, इस स्ट्रैटेजी में जोखिम भी हैं। स्थापित फंड्स के विपरीत, जिनके पास पहले से कैपिटल कमिटेड (Committed) होता है, इंडिपेंडेंट स्पॉन्सर को अक्सर डील-बाय-डील बेसिस पर फाइनेंसिंग (Financing) का इंतज़ाम करना पड़ता है। इससे एग्जीक्यूशन रिस्क (Execution Risk) बढ़ जाता है, क्योंकि डील फाइनल करना स्पॉन्सर की फंड जुटाने की क्षमता पर निर्भर करता है। साथ ही, इन छोटी कंपनियों में बड़े कॉरपोरेशंस (Corporations) की तरह प्रोफेशनल मैनेजमेंट लेयर्स (Management Layers) की कमी हो सकती है, जिससे स्पॉन्सर को ऑपरेशंस (Operations) में ज़्यादा सक्रिय रहना पड़ता है। निवेशकों को स्पॉन्सर की डील सोर्सिंग (Deal Sourcing), कैपिटल जुटाने की क्षमता और छोटे व्यवसायों को बढ़ाने की उनकी ऑपरेशनल एक्सपर्टाइज (Operational Expertise) का मूल्यांकन करना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.