Income Tax Appellate Tribunal (ITAT) ने एक अहम फैसला सुनाते हुए टैक्सपेयर को सेक्शन 54F के तहत **₹14.70 लाख** की बड़ी राहत दी है। इस फैसले ने कंपनी के स्वामित्व वाली प्रॉपर्टी और बिना निवेश वाली जॉइंट प्रॉपर्टी के टैक्स नियमों को और भी साफ कर दिया है।
टैक्स विवादों में फंसे लोगों के लिए यह फैसला एक मिसाल बन सकता है। इनकम टैक्स विभाग ने पहले इस दावे को खारिज कर दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि टैक्सपेयर के पास एक से ज्यादा रेजिडेंशियल हाउस हैं, जो सेक्शन 54F के तहत मिलने वाली छूट के लिए अयोग्य बनाता है।
क्या था विवाद का मुख्य बिंदु?
विवाद इस बात पर था कि प्रॉपर्टी की ओनरशिप (Ownership) की गिनती कैसे की जाए। विभाग ने टैक्सपेयर की लिस्ट में दो एक्स्ट्रा प्रॉपर्टी जोड़ी थीं। पहली वह कंपनी थी जिसके टैक्सपेयर डायरेक्टर थे और दूसरी वह प्रॉपर्टी जो पति के साथ जॉइंट होल्डिंग में थी।
ITAT ने क्या स्पष्ट किया?
ITAT ने कॉर्पोरेट पहचान (Corporate Identity) के सिद्धांत पर जोर दिया। ट्रिब्यूनल ने साफ किया कि कंपनी एक अलग कानूनी इकाई है, इसलिए कंपनी की संपत्ति को डायरेक्टर की निजी संपत्ति नहीं माना जा सकता। इससे टैक्सपेयर के नाम पर दर्ज प्रॉपर्टी की संख्या कम हो गई।
जॉइंट प्रॉपर्टी का गणित
दूसरी प्रॉपर्टी के मामले में कोर्ट ने पाया कि टैक्सपेयर ने खरीदारी में कोई वित्तीय योगदान नहीं दिया था। ट्रिब्यूनल ने माना कि केवल नाम होने से ओनरशिप नहीं बदलती, जब तक कि उसमें निवेश न किया गया हो। इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि संपत्ति के कागजों पर नाम होने से ज्यादा जरूरी 'बेनेफिशियल ओनरशिप' (Beneficial Ownership) है।
यह फैसला उन निवेशकों के लिए एक गाइडलाइन की तरह है जो भविष्य में अपनी टैक्स प्लानिंग करना चाहते हैं। हालांकि, हर केस अलग तथ्यों पर आधारित होता है, लेकिन यह स्पष्ट है कि टैक्स अथॉरिटीज को प्रॉपर्टी एसेट्स की गिनती करते समय अधिक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
