ITAT Nagpur ने एक महत्वपूर्ण फैसले में टैक्सपेयर के ऊपर लगाए गए **₹10 लाख** के टैक्स एडिशन और **₹2.11 लाख** की पेनल्टी को रद्द कर दिया है। शुरुआती उलझन के बावजूद ट्रिब्यूनल ने बैंक रिकॉर्ड्स को सबूत मानकर राहत दी है।
यह मामला एक वेल्थ मैनेजमेंट फर्म में किए गए ₹11.25 लाख के निवेश से जुड़ा है। टैक्स अथॉरिटीज ने ₹1.25 लाख (चेक पेमेंट) को तो सही माना, लेकिन बाकी ₹10 लाख की नकद राशि को 'अनएक्सप्लेंड कैश क्रेडिट' मान लिया था। असेसमेंट के दौरान टैक्सपेयर अपनी बात सही ढंग से नहीं रख पाया और बयानों में बदलाव के कारण स्थिति उलझ गई थी।
ट्रिब्यूनल की सख्ती और बैंक रिकॉर्ड्स की भूमिका
ITAT ने मामले की गहराई से जांच की और टैक्सपेयर द्वारा पेश किए गए बैंक स्टेटमेंट पर ध्यान दिया। रिकॉर्ड्स से साफ हुआ कि अलग-अलग खातों से ₹8 लाख और ₹3.75 लाख की निकासी हुई थी, और मुख्य खाते में भी ₹9.7 लाख से ज्यादा बैलेंस मौजूद था। ट्रिब्यूनल ने माना कि निवेश का पैसा वैध स्रोतों से आया था, जिससे टैक्स विभाग का दावा खारिज हो गया।
606 दिन की देरी पर भी ट्रिब्यूनल का उदार रुख
हैरानी की बात यह रही कि अपील दायर करने में 606 दिनों की देरी हुई थी। हालांकि, ITAT ने तकनीकी आधार पर केस खारिज करने के बजाय मेरिट को प्राथमिकता दी और देरी को माफ कर दिया। कोर्ट ने कहा कि देरी जानबूझकर नहीं थी।
निवेशकों के लिए सबक
यह फैसला साबित करता है कि इनकम टैक्स स्क्रूटनी के दौरान 'बर्डन ऑफ प्रूफ' टैक्सपेयर पर होता है। चाहे आप अपने बयानों में भ्रमित क्यों न हों, यदि आपके पास बैंक ट्रांजेक्शन और फाइनेंशियल डॉक्यूमेंट्स का ठोस रिकॉर्ड है, तो आप कानूनी विवाद से बच सकते हैं।
