Income Tax Appellate Tribunal (ITAT) ने एक निवेशक के हक में बड़ा फैसला सुनाया है। ट्रिब्यूनल ने शेयर की बिक्री पर लगे **₹79 लाख** के टैक्स डिमांड को पूरी तरह से खारिज कर दिया है, जिसे टैक्स विभाग ने प्राइस मैनिपुलेशन का मामला बताया था।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद तब शुरू हुआ जब एक टैक्सपेयर ने शेयरों की बिक्री से हुए मुनाफे पर Income Tax Act की धारा 10(38) के तहत लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) छूट का दावा किया। टैक्स विभाग ने इसे 'अकोमोडेशन एंट्री' (Accommodation Entry) मानकर दावा खारिज कर दिया था। निवेशक ने 2011 में ₹13.5 लाख के शेयर खरीदे थे, जो 1:1 बोनस के बाद 1.2 लाख शेयर हो गए। 2012 में इन्हें ₹77.47 लाख में बेचा गया था, जिस पर टैक्स विभाग ने 'अस्पष्ट आय' का आरोप लगाते हुए टैक्स और सरचार्ज लगा दिया था।
ITAT ने क्यों दी राहत?
मुंबई ITAT ने स्पष्ट किया कि केवल स्टॉक की कीमत में तेजी आना ही किसी हेरफेर का सबूत नहीं है। टैक्स विभाग कोई भी ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया। ट्रिब्यूनल ने माना कि निवेशक ने कॉन्ट्रैक्ट नोट्स, डीमैट अकाउंट स्टेटमेंट और बैंक रिकॉर्ड्स का पूरा ऑडिट ट्रेल पेश किया है, जो ट्रेड की सत्यता को प्रमाणित करता है।
रिटेल निवेशकों के लिए सबक
यह फैसला साबित करता है कि टैक्स जांच के दौरान कागजी सबूत (Paper Trail) कितने महत्वपूर्ण होते हैं। अगर आप भी शेयर बाजार में निवेश करते हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें:
- कॉन्ट्रैक्ट नोट्स: ब्रोकर द्वारा दिए गए हर कॉन्ट्रैक्ट नोट को सुरक्षित रखें।
- डीमैट ट्रांजैक्शन: अपने डीमैट अकाउंट के ट्रांजैक्शन लॉग्स का रिकॉर्ड रखें।
- बैंक स्टेटमेंट: शेयर की खरीद-बिक्री से जुड़ी हर बैंक एंट्री का हिसाब रखें।
रेगुलेटेड स्टॉक एक्सचेंज के जरिए पारदर्शी तरीके से ट्रेड करना और उसका पूरा रिकॉर्ड रखना ही टैक्स विवादों से बचने का एकमात्र तरीका है।
