Mumbai ITAT ने टैक्सपेयर्स के हक में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया है कि नया घर पत्नी के साथ ज्वाइंट नाम पर खरीदने से Section 54 के तहत मिलने वाली कैपिटल गेन्स छूट नहीं रुकेगी। टैक्स अथॉरिटी ने पहले **₹55.48 लाख** का डिडक्शन खारिज कर दिया था, जिसे ट्रिब्यूनल ने पलट दिया है।
विवाद की जड़ क्या थी?
मामला एक ऐसे टैक्सपेयर का है जिन्होंने एक पुरानी प्रॉपर्टी बेची और उससे मिले ₹1.10 करोड़ को नए घर में निवेश किया। हालांकि पूरा पैसा टैक्सपेयर का था, लेकिन उन्होंने नया फ्लैट पत्नी के नाम के साथ ज्वाइंट रजिस्टर कराया। असेसमेंट ईयर 2013-14 में टैक्स विभाग ने ₹55.48 लाख की छूट यह कहकर ठुकरा दी कि प्रॉपर्टी संयुक्त रूप से खरीदी गई है, इसलिए पूरी छूट नहीं दी जा सकती।
ट्रिब्यूनल ने क्या तर्क दिया?
ITAT ने सरकारी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि प्रॉपर्टी के पेपर्स पर किसका नाम है, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि निवेश का पैसा कहां से आया है। ट्रिब्यूनल के पास बैंक स्टेटमेंट और गिफ्ट डीड जैसे पक्के सबूत थे, जिससे साबित हुआ कि पूरा निवेश टैक्सपेयर के कैपिटल गेन्स से ही हुआ था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी का नाम केवल सुविधा के लिए था, न कि मालिकाना हक ट्रांसफर करने के लिए।
ट्रिब्यूनल ने आयकर कानून की धारा 27 और धारा 64 का हवाला देते हुए कहा कि यदि कानून किसी एसेट से होने वाली इनकम के लिए मूल मालिक को जिम्मेदार मानता है, तो टैक्स बेनिफिट्स भी उसे ही मिलने चाहिए।
इन्वेस्टर्स के लिए सीख
यह फैसला निवेशकों को वित्तीय रिकॉर्ड्स को दुरुस्त रखने की सलाह देता है। भविष्य में विवाद से बचने के लिए, अगर आप Section 54 का फायदा लेना चाहते हैं, तो यह साबित करना बेहद जरूरी है कि पैसा आपने ही दिया है। बैंक ट्रेल, फंड ट्रांसफर के साक्ष्य और निवेश के स्रोत के डॉक्यूमेंट्स संभालकर रखना किसी भी कानूनी लड़ाई में आपकी सबसे बड़ी ताकत है।
