कंपनी की उधार लेने की क्षमता में बड़ा इजाफा
IREDA के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की 19 मार्च 2026 को हुई बैठक में कई अहम फैसले लिए गए। FY 2025-26 के लिए कंपनी की उधार सीमा को पहले के ₹30,800 करोड़ से बढ़ाकर ₹35,800 करोड़ कर दिया गया है। यह इजाफा रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए फंड की बढ़ती जरूरत को पूरा करने में मददगार साबित होगा।
अगले फाइनेंशियल ईयर, यानी FY 2026-27 के लिए, IREDA ने ₹40,000 करोड़ तक के नए मार्केट बोर्रोविंग प्रोग्राम को मंजूरी दी है। यह कंपनी की भविष्य की विस्तार योजनाओं के लिए एक मजबूत संकेत है।
पॉलिसी में भी हुआ बदलाव
बोर्ड ने यह भी तय किया कि अब स्टॉक एक्सचेंजों को दी जाने वाली जानकारियों में 'मटेरियल इवेंट' किसे माना जाएगा, इस पर IREDA की पॉलिसी को अपडेट किया गया है। इसका मकसद रेगुलेटरी अनुपालन (Regulatory Compliance) को और बेहतर बनाना और शेयरधारकों के साथ पारदर्शी संवाद बनाए रखना है।
रिन्यूएबल एनर्जी के लिए क्यों जरूरी?
भारत के तेजी से बढ़ते रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में IREDA एक अहम फाइनेंसर है। उधार लेने की यह बढ़ी हुई सीमा IREDA को सौर (Solar), पवन (Wind) और अन्य ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स को और अधिक समर्थन देने में सक्षम बनाएगी, जिससे देश के ग्रीन एनर्जी लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी।
कंपनी की पृष्ठभूमि और वित्तीय स्थिति
1987 में स्थापित IREDA, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) के तहत एक सरकारी कंपनी (PSU) है। यह एक नवरत्न कंपनी और सिस्टमैटिकली इम्पोर्टेन्ट नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) के तौर पर काम करती है। IREDA ने पहले भी अपनी उधार सीमा को बढ़ाया है, जैसे कि मार्च 2025 में FY2024-25 के लिए सीमा को ₹29,200 करोड़ किया गया था। अक्टूबर 2025 में S&P ग्लोबल रेटिंग्स ने IREDA की रेटिंग्स को 'BBB' (लॉन्ग-टर्म) और 'A-2' (शॉर्ट-टर्म) तक अपग्रेड किया था, जो इसे कैपिटल मार्केट्स से बेहतर दरों पर फंड जुटाने में मदद करता है।
जोखिम और चुनौतियां
हालांकि, IREDA को कुछ जोखिमों का सामना भी करना पड़ता है। 31 मार्च 2025 तक, ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) 3.5% और नेट एनपीए 1.37% थे। कंपनी पर आंध्र प्रदेश डिस्कॉम्स जैसे तनावग्रस्त संस्थाओं का भी ₹1,202 करोड़ का बड़ा एक्सपोजर है। कुछ कानूनी मामले और क्वार्टरली नतीजों में एनपीए में थोड़ी वृद्धि भी चिंता का विषय बनी हुई है। इसके अलावा, कंपनी की फंडिंग काफी हद तक डेट मार्केट्स पर निर्भर है, जो ब्याज दरों में बदलाव और लिक्विडिटी की स्थितियों के प्रति संवेदनशील है।