IRDAI ने पब्लिक इंश्योरेंस रजिस्ट्री (PIR) के लिए एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है। यह डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर इंश्योरेंस डेटा को एकीकृत करेगा, जिससे क्लेम सेटलमेंट में आसानी होगी और अनक्लेम्ड फंड्स की समस्या कम होगी। रेगुलेटर ने 30 सितंबर, 2026 तक सुझाव मांगे हैं।
बीमा क्षेत्र को पारदर्शी बनाने के इरादे से Insurance Regulatory and Development Authority of India (IRDAI) ने पब्लिक इंश्योरेंस रजिस्ट्री (PIR) का प्रस्ताव रखा है। इसे एक डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) की तरह विकसित किया जाएगा, जो पूरे इंश्योरेंस सेक्टर के लिए एक इंटरऑपरेबल इंफॉर्मेशन एक्सचेंज लेयर के तौर पर काम करेगा। यह किसी सेंट्रल डेटाबेस की तरह नहीं, बल्कि एक 'फेडरेटेड मॉडल' के रूप में काम करेगा, जहां डेटा संबंधित इंश्योरर के पास ही रहेगा और यूजर की सहमति से सुरक्षित तरीके से एक्सेस किया जा सकेगा।
अनक्लेम्ड फंड्स की समस्या से राहत
मौजूदा समय में ग्राहकों को अपनी पॉलिसी मैनेज करने, उसे ट्रांसफर करने या क्लेम सेटलमेंट में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि अलग-अलग कंपनियों के सिस्टम आपस में नहीं जुड़े हैं। इस रजिस्ट्री का सबसे बड़ा फायदा अनक्लेम्ड इंश्योरेंस राशि को ट्रैक करना होगा। फरवरी 2026 तक, भारत में लावारिस बीमा राशि का आंकड़ा करीब ₹8,973.89 करोड़ तक पहुंच चुका है। PIR के जरिए पॉलिसीहोल्डर्स आसानी से अपनी सक्रिय पॉलिसी को ढूंढ पाएंगे, जिससे कंपनियों की लायबिलिटी मैनेजमेंट में भी सुधार होगा।
चुनौतियां और जोखिम
भले ही यह प्लान बेहतर सर्विस देने के लिए है, लेकिन इसके सामने डेटा प्राइवेसी और साइबर सिक्योरिटी जैसी बड़ी चुनौतियां हैं। सेंसिटिव हेल्थ और फाइनेंशियल डेटा को सुरक्षित रखना रेगुलेटर के लिए एक बड़ी प्राथमिकता होगी। साथ ही, कंपनियों के पुराने 'लीगेसी सिस्टम्स' को नए इंटरऑपरेबल फ्रेमवर्क के साथ जोड़ना भी एक महंगा और तकनीकी रूप से कठिन काम होगा। इससे कंपनियों पर शॉर्ट टर्म में ऑपरेशनल लागत बढ़ने का दबाव भी आ सकता है।
आगे का रास्ता
रेगुलेटर ने इस प्रोजेक्ट पर स्टेकहोल्डर्स की राय लेने के लिए 30 सितंबर, 2026 की डेडलाइन तय की है। अंतिम ढांचा और तकनीकी स्पेसिफिकेशंस इसी फीडबैक पर निर्भर करेंगे। यदि यह सही तरीके से लागू होता है, तो इंश्योरेंस इंडस्ट्री डेटा-संचालित और अधिक पारदर्शी हो जाएगी, जिसका सीधा लाभ पॉलिसीहोल्डर्स को मिलेगा।
