निजी लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों का प्रीमियम भले ही **14%** की सालाना दर से बढ़ रहा हो, लेकिन उनके खर्चे **20%** की रफ्तार से भाग रहे हैं। IRDAI के नए प्रस्तावों के बाद निवेशकों को मार्जिन पर दबाव दिखने का डर है।
बीमा क्षेत्र एक अजीब विरोधाभास में फंसा हुआ है। FY22 से FY25 के बीच प्राइवेट लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों का बिजनेस प्रीमियम 14% बढ़ा है, लेकिन इसी दौरान उनके ऑपरेटिंग खर्चे 20% तक उछल गए हैं। इसका सीधा मतलब है कि बिजनेस लाने और उसे संभालने की लागत कमाई से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है, जो मुनाफे को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।
क्यों बेअसर हो रही है ग्रोथ?
समस्या यह है कि व्यक्तिगत प्रीमियम में तो 10% की सालाना बढ़ोतरी दिख रही है, लेकिन पॉलिसी बेचने की संख्या में 2% की सालाना गिरावट आई है। कंपनियां नए ग्राहकों तक पहुंचने के बजाय पुराने ग्राहकों को ही महंगे प्लान बेच रही हैं। यही वजह है कि भारत में इंश्योरेंस पेनिट्रेशन (Insurance Penetration) अभी भी 3.7% पर अटका है, जबकि ग्लोबल औसत 7.3% है।
IRDAI का कड़ा रुख
रेगुलेटर IRDAI ने 23 सितंबर 2026 को एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है, जिसका नाम है 'Recalibrating Economics of Insurance Distribution'। इसके तहत:
- लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के लिए मैनेजमेंट खर्च की सीमा (EoM) को 12.5% करने का लक्ष्य है।
- जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के लिए यह सीमा 20% प्रस्तावित है।
- 2023 में हटाई गई कमीशन की सीमा (Commission Caps) को वापस लाने पर विचार किया जा रहा है ताकि खर्चों पर लगाम लग सके।
निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
बाजार के लिए यह 'हाई-कॉस्ट, लो-पेनिट्रेशन' मॉडल अब मुसीबत बन सकता है। जो कंपनियां bancassurance जैसे महंगे डिस्ट्रिब्यूशन चैनलों पर निर्भर हैं, उन्हें सबसे ज्यादा चोट लग सकती है। आने वाले समय में कंपनियों को अपनी तकनीक और अंडरराइटिंग क्षमता पर ज्यादा जोर देना होगा। निवेशकों को अब तिमाही नतीजों के दौरान मैनेजमेंट की कमेंट्री पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए कि वे कैसे अपने खर्चों को इन नए नियमों के मुताबिक ढालते हैं।
