इंश्योरेंस रेगुलेटर IRDAI ने शेयर ट्रांसफर की प्रोसेसिंग फीस को **₹50 लाख** से घटाकर **₹10 लाख** कर दिया है। नए मास्टर सर्कुलर में IPO लाने वाली कंपनियों और मर्जर पर भी कड़े नियम लागू किए गए हैं।
बीमा क्षेत्र के रेगुलेटर IRDAI ने 2 नवंबर, 2026 को इंडस्ट्री के लिए नियमों में बड़े बदलावों का ऐलान किया है। 'सबका बीमा एक्ट, 2025' के तहत जारी इस नए मास्टर सर्कुलर का सबसे बड़ा आकर्षण शेयर ट्रांसफर फीस में 80% की भारी कटौती है।
IPO और डिस्क्लोजर के नए मानक
बीमा कंपनियों के लिए अब IPO की राह पहले से अधिक अनुशासित होगी। नई गाइडलाइंस के मुताबिक, कंपनियों को अपने ऑफर डॉक्यूमेंट में फ्रेश इश्यू और ऑफर फॉर सेल (OFS) का पूरा विवरण देना अनिवार्य होगा। साथ ही, कंपनियों को अपनी पिछली रेगुलेटरी कार्रवाइयों का भी पूरा खुलासा करना होगा ताकि निवेशकों को सही जानकारी मिल सके।
मर्जर और ESOP पर लगाम
सेक्टर में होने वाले मर्जर और अमलगमेशन (Amalgamation) पर भी रेगुलेटर की पैनी नजर रहेगी। कंपनियों को अब एक इंडिपेंडेंट एक्ट्यूअरियल असेसमेंट (Independent Actuarial Assessment) जमा करना होगा, जिससे यह साबित हो सके कि इस सौदे से कंपनी की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी, सॉल्वेंसी रेशियो और प्रोडक्ट प्राइसिंग पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।
इसके अलावा, कर्मचारी स्टॉक ऑप्शन प्लान यानी ESOP्स को लेकर भी स्पष्ट नियम तय कर दिए गए हैं। अब किसी भी इक्विटी-बेस्ड मुआवजे को वैधानिक शेयरहोल्डिंग लिमिट के दायरे में ही रखना होगा। यदि किसी कीमती मैनेजमेंट के व्यक्ति के स्टॉक ऑप्शन से यह सीमा पार होती है, तो कंपनी को पहले रेगुलेटर से मंजूरी लेनी होगी।
निवेशकों के लिए सबक
रेगुलेटर का यह कदम कॉर्पोरेट गवर्नेंस और पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा बदलाव है। हालांकि ट्रांसफर फीस कम होने से कंपनियों की लागत जरूर घटेगी, लेकिन IPO और मर्जर के लिए बढ़ी हुई जवाबदेही कंपनियों के डॉक्यूमेंटेशन और प्लानिंग पर दबाव बढ़ाएगी। निवेशकों को अब बीमा कंपनियों के स्ट्रक्चरल बदलावों और उनकी तैयारी पर बारीक नजर रखने की जरूरत होगी।
