इंश्योरेंस ब्रोकर कमीशन में **173%** की बढ़ोतरी निवेशकों को डरा रही है, लेकिन यह कोई भारी खर्च नहीं बल्कि रेगुलेटरी बदलाव है। IRDAI के नए 'Expense of Management' नियमों के कारण रिपोर्टिंग का तरीका बदल गया है, न कि पैसा बांटने का।
कमीशन में भारी बढ़ोतरी का असली सच
जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के कमीशन में FY23 से FY25 के बीच जो 173% का बड़ा उछाल दिख रहा है, वह असल में डिस्ट्रीब्यूटर्स की कमाई नहीं है। IRDAI ने FY24 में 'Expense of Management' का एक नया ढांचा लागू किया, जिससे कंपनियों को खर्च दिखाने के तरीके बदलने पड़े।
कैसे बदला खर्च का हिसाब-किताब?
पुराने नियमों में विज्ञापन (Advertising) और बिजनेस डेवलपमेंट का खर्च कमीशन से अलग दिखाया जाता था। नए नियमों में इन सभी खर्चों को अब 'कमीशन' के दायरे में ही जोड़ दिया गया है। यही कारण है कि बैलेंस शीट में कमीशन का आंकड़ा अचानक बढ़ गया है। इसके उलट, अन्य मदों में बड़ी गिरावट दिखी है—विज्ञापन खर्च में 72% और सेल्स प्रमोशन में 76% की कमी दर्ज की गई है।
इंडस्ट्री के कुल खर्च पर नजर
अगर पूरे इंडस्ट्री के खर्च को देखें, तो मामला संतुलित दिखता है। कुल कमीशन और ऑपरेटिंग खर्च में 25% की बढ़ोतरी हुई है, जो कि उसी दौरान प्रीमियम में हुई 19.7% की वृद्धि के अनुरूप है। इसका मतलब है कि कंपनियां नियंत्रण से बाहर खर्च नहीं कर रही हैं।
हालांकि, हर ₹100 के प्रीमियम पर खर्च का अनुपात (Cost Ratio) बढ़कर 32.1% हो गया है। इसके पीछे क्रॉप इंश्योरेंस के कम मार्जिन वाले बिजनेस में गिरावट और मल्टी-ईयर पॉलिसी प्रीमियम की रिकॉर्डिंग में बदलाव जैसे तकनीकी कारण शामिल हैं।
निवेशकों के लिए क्या है जरूरी?
अब रेगुलेटर कमीशन की जगह 'Expense of Management' की कुल लिमिट पर जोर दे रहे हैं। जनरल इंश्योरेंस के लिए यह लिमिट प्रीमियम का 30% और स्टैंडअलोन हेल्थ इंश्योरेंस के लिए 35% तय है। FY26 तक 21 में से 29 कंपनियां इन नियमों का पालन कर रही हैं। निवेशकों को अब अलग-अलग खर्चों को देखने के बजाय 'Aggregate Expense of Management Ratio' पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही कंपनी की असल एफिशिएंसी को दर्शाता है।
