IIT-Bombay की रिसर्च में **15 अक्टूबर** से लागू होने वाले **0.4%** UPI मर्चेंट चार्ज पर सवाल उठाए गए हैं। जानकारों ने इसे घटाकर **0.08%** करने की सलाह दी है, ताकि दुकानदारों पर बोझ न पड़े।
फीस पर क्यों मचा है विवाद?
IIT-बॉम्बे के प्रोफेसर आशीष दास और प्रज्ञा दास ने अपनी स्टडी में मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को सीमित करने की वकालत की है। NPCI ने 2,000 रुपये से ऊपर के ट्रांजैक्शन पर 0.4% फीस वसूलने की योजना बनाई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि यह दर काफी ज्यादा है।
बैंकों के लिए क्या है विकल्प?
रिपोर्ट का मुख्य तर्क यह है कि बैंकों को UPI इंफ्रास्ट्रक्चर के मेंटेनेंस के लिए दुकानदारों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। पिछले फाइनेंशियल ईयर में बैंकों ने CASA डिपॉजिट से ₹4.85 लाख करोड़ से ज्यादा का नेट इंटरेस्ट मार्जिन कमाया है। स्टडी का कहना है कि इसी मार्जिन का एक छोटा हिस्सा UPI के खर्चों को कवर करने के लिए पर्याप्त है। अगर सरकार 0.08% की सिफारिश मानती है, तो पेमेंट एग्रीगेटर्स और बैंकों की कमाई पर बड़ा असर पड़ सकता है।
दुकानदारों की चिंता और त्योहारी सीजन
फेस्टिव सीजन के ठीक पहले प्रस्तावित फीस को लेकर व्यापारियों में भारी नाराजगी है। छोटे कारोबारियों को डर है कि अगर यह एक्स्ट्रा कॉस्ट उन पर डाली गई, तो डिजिटल पेमेंट के बजाय लोग फिर से कैश का इस्तेमाल करने लगेंगे, जिससे बिजनेस प्रभावित होगा। कई व्यापारी संगठनों ने NPCI से इस फैसले को टालने की औपचारिक मांग भी की है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों के लिए अगले कुछ दिन काफी अहम हैं। बाजार को अब यह देखना होगा कि क्या NPCI या रेगुलेटर इस 0.4% के नियम में कोई बदलाव करते हैं या इसे स्थगित करते हैं। फिनटेक और बैंकिंग सेक्टर के शेयरों पर इस फैसले का सीधा असर होगा, इसलिए सरकार और रेगुलेटरी बॉडी के किसी भी नोटिफिकेशन पर कड़ी नजर बनाए रखें।
