IIT Bombay की एक नई रिपोर्ट ने UPI पर प्रस्तावित **0.4%** MDR शुल्क को लेकर चिंता जताई है। इस कदम से डिजिटल पेमेंट के प्रति लोगों के भरोसे और इसकी ग्रोथ पर असर पड़ सकता है। फिलहाल NPCI इस नियम को लागू करने की तारीख को **15 अक्टूबर, 2026** से आगे बढ़ाने पर विचार कर रही है।
डिजिटल पेमेंट्स की दुनिया में एक बड़ा बदलाव आने की आहट है, लेकिन IIT Bombay की रिसर्च ने इस पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संस्थान का मानना है कि UPI ट्रांजैक्शंस पर लगने वाला नया मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) फ्रेमवर्क डिजिटल क्रांति की रफ्तार को धीमा कर सकता है।
क्या है पूरा मामला?
प्रस्ताव के अनुसार, ₹2,000 से ऊपर के P2M (Person-to-Merchant) ट्रांजैक्शंस पर 0.4% का शुल्क लगाने की बात है, जिसमें अधिकतम कैप ₹300 प्रति ट्रांजैक्शन (₹75,000 से ज्यादा के भुगतान के लिए) तय की गई है। हालांकि NPCI का उद्देश्य पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए एक सस्टेनेबल रेवेन्यू मॉडल तैयार करना है, लेकिन विशेषज्ञों का डर है कि यह सीधे ग्राहकों और छोटे दुकानदारों को प्रभावित करेगा।
IIT Bombay के सुझाव:
संस्थान ने सुझाव दिया है कि इसे पूरी तरह लागू करने के बजाय सिलेक्टिव रखा जाए। उनकी सलाह है कि:
- शुल्क केवल उन बड़े मर्चेंट्स पर लगाया जाए जिनका टर्नओवर ₹50 करोड़ से ज्यादा है।
- रेलवे टिकट, फ्यूल, इंश्योरेंस और लोन EMI जैसे जरूरी सेक्टर्स को इस शुल्क से पूरी तरह बाहर रखा जाए।
डेडलाइन पर सस्पेंस:
बाजार में चर्चा है कि 15 अक्टूबर, 2026 की डेडलाइन को बढ़ाकर 1 जनवरी, 2027 किया जा सकता है। यह देरी फेस्टिवल सीजन की भारी डिमांड को देखते हुए और इंडस्ट्री की तैयारियों को परखने के लिए की जा रही है।
रिस्क फैक्टर:
सबसे बड़ा डर यह है कि अगर दुकानदार पर ऑपरेटिंग कॉस्ट का दबाव बढ़ेगा, तो वे इसे ग्राहकों पर डाल सकते हैं। इससे UPI ट्रांजैक्शंस के प्रति लोगों का लगाव कम हो सकता है। अब पूरी इंडस्ट्री की नजरें NPCI और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के अंतिम फैसले पर टिकी हैं कि वे सर्विस प्रोवाइडर्स की कमाई और डिजिटल अडॉप्शन के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं।
