सुरक्षा बढ़ाई गई, ₹590 करोड़ के झोल के बाद नए नियम लागू
IDFC First Bank ने हरियाणा सरकार के खातों से जुड़ी ₹590 करोड़ की एक बड़ी वित्तीय गड़बड़ी के सामने आने के बाद अपने ट्रांज़ैक्शन सिस्टम में कई बड़े बदलाव किए हैं। अब बैंक अपनी शाखाओं में होने वाले बड़े मूल्य के ट्रांज़ैक्शन्स (high-value transactions) के लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा परत लागू कर रहा है। इसके तहत, तय सीमा से ज़्यादा के किसी भी ट्रांज़ैक्शन के लिए ग्राहक के मोबाइल ऐप पर डिजिटल कन्फर्मेशन लेना अनिवार्य होगा। ग्राहकों को अपने रजिस्टर्ड मोबाइल ऐप पर एक अलर्ट मिलेगा, जिसमें लॉग इन करके एक निश्चित समय-सीमा के अंदर अप्रूवल देना होगा। यह प्रक्रिया पहले सिर्फ फोन कॉल पर कन्फर्मेशन लेने से काफी अलग है और इसका उद्देश्य बड़े ऑपरेशन्स की सुरक्षा को मजबूत करना और गलतियों या अनधिकृत गतिविधियों की गुंजाइश को खत्म करना है।
₹590 करोड़ के वित्तीय झोल का पूरा सच
यह मामला तब सामने आया जब हरियाणा सरकार ने फंड ट्रांसफर करते समय अपने खातों में रिपोर्ट किए गए बैलेंस और वास्तव में उपलब्ध राशि के बीच बड़ा अंतर पाया। शुरुआती गड़बड़ी करीब ₹490 करोड़ की थी, लेकिन इंटरनल स्कैनिंग में इसी से जुड़े अन्य खातों में ₹100 करोड़ और सामने आए, जिससे कुल राशि लगभग ₹590 करोड़ तक पहुंच गई। यह विसंगति तब और प्रमुखता से सामने आई जब 18 फरवरी के बाद विभिन्न सरकारी विभागों ने अपने खाते बंद करना शुरू किया। बैंक के CEO V Vaidyanathan के अनुसार, अब बड़े ट्रांज़ैक्शन्स को कन्फर्म करने के लिए सिस्टम-बेस्ड डिजिटल अप्रूवल लिया जाएगा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल इन ऑपरेशन्स को वेरिफाई करने में होगा, जिससे मानवीय हस्तक्षेप कम हो सकेगा। बैंक की शुरुआती जांचों में यह बात सामने आई है कि यह समस्या केवल ऑपरेशनल स्तर पर हुई है और इसमें बैंक के सीनियर मैनेजमेंट की कोई भूमिका नहीं है।
KPMG की फॉरेंसिक ऑडिट जारी, जवाबदेही तय होगी
इस पूरी घटना की गहराई से जांच करने और दोषियों का पता लगाने के लिए KPMG को फॉरेंसिक ऑडिट (forensic audit) की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह ऑडिट अभी जारी है और इसके नतीजे अगले चार से पांच हफ़्तों में आने की उम्मीद है। यह ऑडिट न केवल यह स्थापित करेगा कि क्या गलत हुआ, बल्कि सभी संबंधित पक्षों की जवाबदेही भी तय करेगा। इस तरह की बड़ी गड़बड़ी बैंक के इंटरनल कंट्रोल सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करती है, खासकर ब्रांच लेवल पर। जमाकर्ताओं का भरोसा बनाए रखने और रेगुलेटरी बॉडीज का विश्वास जीतने के लिए यह ज़रूरी है कि बैंक इस मामले को पारदर्शी तरीके से संभाले और ऑडिट के नतीजों का इंतज़ार करे।