प्राइवेटाइजेशन की उम्मीदें खत्म, शेयर क्यों गिरा?
IDBI Bank के शेयर पिछले कुछ समय से जिस रफ्तार से गिर रहे हैं, वह निवेशकों को चिंता में डाल रहा है। जनवरी 2026 के अपने ₹118.45 के 52-Week High से यह शेयर 27 मार्च 2026 तक लुढ़क कर करीब ₹64 पर आ गया था। इसके बाद भी गिरावट थमी नहीं और 30 मार्च 2026 को यह ₹61.50 के स्तर पर कारोबार कर रहा था।
इस बड़ी गिरावट की मुख्य वजह सरकार और LIC द्वारा IDBI Bank में हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया का अटकना है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, डील में आई बोलियां (Bids) उम्मीद के मुताबिक नहीं थीं, यानी वे तय रिजर्व प्राइस (Reserve Price) को पूरा नहीं कर पाईं। इसके चलते निवेशकों ने जो 'प्राइवेटाइजेशन प्रीमियम' (Privatisation Premium) शेयर के भाव में जोड़ा था, वह पूरी तरह से खत्म हो गया। अब निवेशक बैंक के फंडामेंटल वैल्यू (Fundamental Value) पर ही विचार कर रहे हैं।
सेक्टर की चमक में IDBI Bank की फिसड्डी
प्राइवेट खरीदार के आने से मैनेजमेंट में सुधार, मुनाफे में बढ़ोतरी और बेहतर गवर्नेंस (Governance) की उम्मीदें अब धूमिल हो गई हैं। ऐसे में IDBI Bank का शेयर अब अपने मौजूदा प्रदर्शन के आधार पर ही वैल्यू किया जा रहा है, न कि भविष्य की किसी बड़ी संभावना के आधार पर। मार्च 2026 में, IDBI Bank का P/E रेश्यो (Price-to-Earnings Ratio) करीब 7.11x या 8.6x था, जो कि भारतीय बैंकों के इंडस्ट्री एवरेज 11.3x और साथियों के एवरेज 12.8x से काफी कम है। इससे साफ है कि मार्केट एक बार फिर इसे पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSU) के तौर पर ही देख रहा है, न कि किसी प्राइवेट कंपनी के तौर पर।
यह सब तब हो रहा है जब भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए 2026 का आउटलुक (Outlook) काफी पॉजिटिव बना हुआ है। फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) और अन्य एक्सपर्ट्स का मानना है कि बेहतर रेगुलेशन, कम सिस्टमैटिक रिस्क और मजबूत कैपिटल रिजर्व्स का फायदा भारतीय बैंकों को मिलेगा। क्रेडिट ग्रोथ (Credit Growth) अच्छी रहने और एसेट क्वालिटी (Asset Quality) स्थिर रहने की उम्मीद है। हाल ही में इस सेक्टर का मार्केट वैल्यू FY26 में 18% बढ़कर ₹108 लाख करोड़ हो गया था, जिसमें PSU बैंकों और NBFCs का बड़ा योगदान रहा।
एनालिस्ट्स की 'Sell' रेटिंग और रिस्क
हालांकि IDBI Bank का करंट वैल्यूएशन आकर्षक लग रहा है और इसका डिविडेंड यील्ड (Dividend Yield) करीब 2.73% से 3.13% है, लेकिन इसमें अभी भी बड़े रिस्क बने हुए हैं। सबसे बड़ी चिंता मालिकाना हक और भविष्य की योजनाओं को लेकर अनिश्चितता है। अगर सरकार और LIC प्राइवेटाइजेशन को और टालते हैं, तो शेयर इसी निचले वैल्यूएशन रेंज में फंसा रह सकता है। इकोनॉमी में मंदी आने पर NPA (Non-Performing Assets) का खतरा फिर बढ़ सकता है, खासकर बैंक के पुराने ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए।
एनालिस्ट्स (Analysts) भी इन चिंताओं को दोहरा रहे हैं। नौ एनालिस्ट्स में से ज्यादातर की 'Sell' रेटिंग है और उन्होंने ₹42.84 का एवरेज टारगेट प्राइस (Target Price) दिया है, जो मौजूदा भाव से 33% से ज्यादा की गिरावट का संकेत देता है। यह नेगेटिव आउटलुक साफ तौर पर प्राइवेटाइजेशन के अनिश्चित रास्ते और लगातार कमाई बढ़ाने की क्षमता पर संदेह के कारण है।