IDBI Bank में सरकार और LIC अपनी **60.72%** हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में हैं, लेकिन Fairfax Financial Holdings द्वारा की जा रही यह करीब **$5.5 अरब** की डील अब कानूनी और रेगुलेटरी बाधाओं में उलझ गई है।
रेगुलेटरी चुनौतियां और ओनरशिप नियम
इस डील के सामने सबसे बड़ी बाधा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का 'टू-बैंक' नियम है। यह नियम किसी एक प्रमोटर को एक साथ दो अलग-अलग बैंकिंग संस्थाओं को नियंत्रित करने से रोकता है। चूंकि Fairfax के पास पहले से ही CSB Bank में 40% हिस्सेदारी है, इसलिए IDBI Bank का अधिग्रहण सीधे तौर पर इन नियमों का उल्लंघन करता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार Fairfax को इस उलझन को सुलझाने के लिए 2 साल का ग्रेस पीरियड देने पर विचार कर रही है, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि का निवेशकों को इंतजार है।
ओपन ऑफर और वैल्यूएशन पर सवाल
इसके अलावा, SEBI के टेकओवर रेगुलेशन भी इस डील के लिए एक तकनीकी सिरदर्द बने हुए हैं। इतने बड़े स्तर पर हिस्सेदारी ट्रांसफर होने पर 'मेंडेटरी ओपन ऑफर' के तहत खरीदार को पब्लिक शेयरधारकों से अतिरिक्त 26% शेयर खरीदने पड़ सकते हैं, जिससे डील की लागत काफी बढ़ जाएगी।
इसके साथ ही, बिडिंग प्रक्रिया में पारदर्शिता और बैंक की रियल एस्टेट एसेट्स की वैल्यूएशन को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि मौजूदा रिजर्व प्राइस बैंक की संपत्तियों की सही कीमत नहीं दर्शाते।
निवेशकों के लिए संकेत
IDBI Bank ने स्टॉक एक्सचेंज को स्पष्ट किया है कि उनके पास विनिवेश से जुड़ी कोई भी गुप्त जानकारी नहीं है और पूरी प्रक्रिया का प्रबंधन DIPAM (Department of Investment and Public Asset Management) कर रहा है। फिलहाल निवेशकों के लिए यह जरूरी है कि वे बाजार की अफवाहों के बजाय केवल आधिकारिक घोषणाओं और कैबिनेट की मंजूरी पर नजर रखें।
