वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि 2003 का 'रिपील एक्ट' IDBI Bank के निजीकरण में बाधा नहीं है। दिल्ली हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए सरकार ने उन कानूनी तर्कों को खारिज कर दिया है, जो अब तक हिस्सेदारी बिक्री की प्रक्रिया में बाधा बने हुए थे।
कानूनी बाधाएं हुई खत्म
केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि 2003 का IDBI (रिपील) एक्ट सरकार को अपनी हिस्सेदारी कम करने से नहीं रोकता है। इस स्पष्टीकरण का मुख्य उद्देश्य उस कानूनी अनिश्चितता को दूर करना है, जिसने लंबे समय से बैंक के निजीकरण के रोडमैप को उलझा रखा था।
कोर्ट का क्या है रुख?
सरकार का पक्ष 2018 के दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले पर टिका है, जो 'ऑल इंडिया IDBI ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम भारत संघ' मामले में आया था। कोर्ट ने उस समय 'प्रॉमिसरी एस्टॉपल' के सिद्धांत को खारिज कर दिया था, जिसका मतलब है कि संसद में दी गई पुरानी दलीलें अब कानून के स्पष्ट प्रावधानों पर हावी नहीं हो सकतीं। इस फैसले के जरिए सरकार अब अपनी हिस्सेदारी को 50% से नीचे लाने के लिए आगे बढ़ रही है।
विनिवेश की लंबी प्रक्रिया
बैंक का निजीकरण करीब 1 दशक से सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है, जिसके संकेत 2016-17 के बजट में मिले थे। अब सरकार और LIC मिलकर बैंक में अपनी संयुक्त हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में हैं।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
कानूनी रास्ता साफ होना निवेश प्रक्रिया के लिए एक बड़ा कदम जरूर है, लेकिन फाइनल सेल अभी भी कई बाहरी कारकों पर निर्भर है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है Reserve Bank of India (RBI) के कड़े 'फिट-एंड-प्रॉपर' मानदंड और बाजार की स्थिति। नए मालिक की साख और उनकी लॉन्ग-टर्म बिजनेस रणनीति पर ही बैंक का भविष्य टिका होगा। फिलहाल, निवेशकों की नजरें अब बिडिंग शेड्यूल और सरकार की आगामी घोषणाओं पर टिकी हैं।
