IDBI Bank के निजीकरण की प्रक्रिया में अब पेच फंसता दिख रहा है। पूर्व सरकारी सचिव EAS Sarma ने एसेट की गलत वैल्युएशन और संभावित कानूनी जोखिमों का हवाला देते हुए इस बिक्री पर रोक लगाने की मांग की है, जिससे सरकार और LIC के विनिवेश प्लान पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं।
विनिवेश की प्रक्रिया में बड़ी बाधा
IDBI Bank के विनिवेश का सफर एक नई मुश्किल में फंस गया है। पूर्व सचिव EAS Sarma ने सरकार द्वारा 60.72% हिस्सेदारी बेचने के फैसले पर कड़े सवाल उठाए हैं। यह हिस्सा भारत सरकार और LIC मिलकर Fairfax Financial Holdings को बेचने की तैयारी में हैं। Sarma ने कैबिनेट कमिटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स से इस प्रक्रिया को रोकने की अपील की है, क्योंकि उनके अनुसार ₹52,878 करोड़ की वैल्युएशन बैंक की वास्तविक बाजार कीमत को सही ढंग से नहीं दर्शाती है।
रियल एस्टेट और कानूनी पेंच
इस शिकायत का एक बड़ा हिस्सा बैंक की रियल एस्टेट संपत्तियों से जुड़ा है। तर्क यह है कि लैंड एक्विजिशन एक्ट, 1894 के तहत सार्वजनिक उपयोग के लिए अधिग्रहित जमीन अगर किसी निजी कंपनी को ट्रांसफर की जाती है, तो कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। आरोप है कि बिडिंग डॉक्यूमेंटेशन में इन जोखिमों को ठीक से नहीं दिखाया गया है, जिससे भविष्य में बड़े कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं।
रेगुलेटरी चुनौतियां और आगे का रास्ता
खरीदार Fairfax Financial Holdings को लेकर भी सवाल खड़े किए गए हैं। चूंकि Fairfax की पहले से ही Catholic Syrian Bank में बड़ी हिस्सेदारी है, इसलिए Reserve Bank of India के सिंगल-प्रमोटर कंट्रोल गाइडलाइंस के तहत रेगुलेटरी मुश्किलें आ सकती हैं। साथ ही, कर्मचारियों की नौकरी और रिजर्वेशन पॉलिसी को लेकर भी चिंताएं जताई गई हैं।
निवेशकों के लिए यह स्थिति सतर्क रहने वाली है। बैंक 2021 में ही RBI के प्रॉम्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) फ्रेमवर्क से बाहर निकला है और निजीकरण को वैल्यू अनलॉकिंग के तौर पर देखा जा रहा था। अब बाजार की नजरें DIPAM और सरकारी प्रतिक्रिया पर टिकी हैं कि क्या विनिवेश का टाइमलाइन बरकरार रहता है या इसमें और देरी होगी।
