IDBI Bank के विनिवेश (Divestment) की प्रक्रिया में बड़ी रुकावट आ गई है। खरीदारों द्वारा लगाई गई बोलियां सरकार की उम्मीदों से काफी कम हैं, जिसके चलते यह डील अटक गई है। बैंक की वित्तीय स्थिति में सुधार और बैड लोन (Bad Loans) में कमी के बावजूद, मूल्यांकन (Valuation) को लेकर मतभेद ने बातचीत को रोक दिया है।
क्यों अटकी IDBI Bank की डील?
IDBI Bank के विनिवेश की योजना को बड़ा झटका लगा है क्योंकि संभावित खरीदारों ने सरकार के निर्धारित रिजर्व प्राइस (Reserve Price) से कम बोलियां लगाई हैं। सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) मिलकर बैंक में लगभग 60% से 61% हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में हैं। लेकिन, खरीदारों और सरकार के बीच मूल्यांकन (Valuation) को लेकर बड़ा अंतर पैदा हो गया है, जिससे डील की टाइमलाइन पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
बदली तस्वीर, फिर भी कीमत पर पेंच
यह गौर करने वाली बात है कि IDBI Bank की वित्तीय सेहत में पिछले कुछ सालों में ज़बरदस्त सुधार आया है। बैंक ने अपने ग्रॉस बैड लोंस यानी नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) को काफी हद तक कम कर लिया है। जहां 2022 के मध्य में यह 20% के करीब थे, वहीं 2025 की शुरुआत तक घटकर 2.5% से 3% के बीच आ गए हैं। इसके अलावा, बैंक की कैपिटल एडिक्वेसी (Capital Adequacy) जो 25% से ऊपर पहुंच गई है, यह दर्शाती है कि अब यह वित्तीय रूप से काफी मजबूत है। उम्मीद थी कि इस सुधार के बाद बैंक खरीदारों के लिए और आकर्षक बनेगा, लेकिन कीमत को लेकर बात नहीं बन पा रही है।
डील फाइनल करने में चुनौतियां
2026 की शुरुआत में हुई बोलियों में सरकार को उम्मीद के मुताबिक भाव नहीं मिले। हालांकि, बाजार की मौजूदा स्थिति और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों को खरीदारों के सतर्क रवैये की वजह बताया जा रहा है, लेकिन असली मुद्दा बैंक के मूल्यांकन पर असहमति ही है। जहां सरकार बैंक के टर्नअराउंड (Turnaround) को कीमत में शामिल कर रही है, वहीं खरीदार अधिक रूढ़िवादी (Conservative) दिख रहे हैं। इसके अलावा, विभिन्न कर्मचारी यूनियनों (Employee Unions) का लगातार विरोध भी इस प्रक्रिया में सामाजिक और परिचालन संबंधी बाधाएं पैदा कर रहा है।
विनिवेश प्रक्रिया का स्टेटस
फिलहाल इस गतिरोध के बावजूद, डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (DIPAM) ने स्पष्ट किया है कि बिक्री की प्रक्रिया अभी जारी है। सरकार विनिवेश योजना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जता चुकी है और ऐसी खबरें हैं कि अधिकारी इस मूल्य अंतर को पाटने के लिए कीमत की फिर से समीक्षा पर काम कर रहे हैं।
इस क्षेत्र में नजर रखने वाले निवेशकों को सरकार के अगले कदमों पर ध्यान देना चाहिए, खासकर संशोधित रिजर्व प्राइस (Revised Reserve Price) या बोली प्रक्रिया की नई टाइमलाइन को लेकर किसी भी अपडेट का इंतजार करना होगा। आने वाले महीनों में खरीदारों के साथ बातचीत कितनी आगे बढ़ेगी, यह बैंक की लाभप्रदता (Profitability) और संपत्ति की गुणवत्ता (Asset Quality) बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगा।
