ICAI अब एकाउंटिंग सेक्टर में प्राइवेट इक्विटी (PE) निवेश को मंजूरी देने पर विचार कर रहा है। यह प्रस्ताव कंसल्टिंग और एडवाइजरी जैसे नॉन-ऑडिट वर्टिकल्स के लिए है, ताकि घरेलू फर्मों को विस्तार और टेक्नोलॉजी के लिए जरूरी पूंजी मिल सके।
ICAI ने एक इंटरनल कमेटी का गठन किया है जो यह देखेगी कि क्या नॉन-एश्योरेंस बिजनेस सेगमेंट में प्राइवेट इक्विटी (PE) निवेश की इजाजत दी जा सकती है। यह बदलाव केवल कंसल्टेंसी, एडवाइजरी और बुककीपिंग जैसे क्षेत्रों के लिए है, जबकि स्टेट्यूटरी और टैक्स ऑडिट को इससे पूरी तरह अलग रखा जाएगा। इसका मुख्य मकसद भारतीय फर्मों को ग्लोबल नेटवर्क के मुकाबले मजबूत बनाना है।
फर्मों को मिलेगी नई ताकत
आज के समय में ग्लोबल अकाउंटिंग नेटवर्क के पास भारी पूंजी और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी होती है, जिसके सामने छोटी घरेलू फर्में पिछड़ जाती हैं। इस निवेश के जरिए भारतीय फर्में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा एनालिटिक्स जैसी तकनीकों में निवेश कर सकेंगी, जो आज के समय में एडवाइजरी बिजनेस के लिए बेहद जरूरी हैं।
'रिंग-फेंस' मॉडल से होगी सुरक्षा
इथिक्स से समझौता न हो, इसके लिए एक सख्त 'रिंग-फेंस' मॉडल का प्रस्ताव है। इसका मतलब है कि जिस बिजनेस में PE निवेश आएगा, वह ऑडिट ऑपरेशंस से पूरी तरह अलग होगा। इससे किसी भी प्रकार का कमर्शियल दबाव ऑडिट की क्वालिटी पर असर नहीं डाल पाएगा।
कानून में बदलाव की जरूरत
फिलहाल, Chartered Accountants Act, 1949 के तहत CA फर्मों के लिए PE फंड जुटाना प्रतिबंधित है। यदि ICAI इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाता है, तो कानून में बदलाव के लिए सरकार की मंजूरी अनिवार्य होगी। इसके अलावा, NFRA जैसी रेगुलेटरी संस्थाओं की कड़ी निगरानी को देखते हुए यह एक जटिल प्रक्रिया होगी, जिस पर निवेशकों और स्टेकहोल्डर्स की नजर बनी हुई है।
