ICAI ने सरकारी कंसल्टेंसी कॉन्ट्रैक्ट्स के नियमों में बदलाव की मांग की है। अब **₹5 करोड़** तक के टेंडर्स के लिए टर्नओवर की जगह 'प्रोजेक्ट अनुभव' को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि विदेशी फर्मों का दबदबा कम हो सके।
टेंडर नियमों में बड़ा बदलाव
ICAI का मानना है कि मौजूदा सिस्टम में ऊंची टर्नओवर लिमिट्स के कारण छोटी लेकिन काबिल भारतीय फर्म्स सरकारी काम पाने से वंचित रह जाती हैं। नई व्यवस्था में, वित्तीय मजबूती के बजाय यह देखा जाएगा कि फर्म ने पहले किस तरह के प्रोजेक्ट्स डिलीवर किए हैं। इससे भारतीय फर्म्स के लिए बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स के दरवाजे खुलेंगे, जिन पर अब तक अक्सर 'बिग फोर' (Big Four) जैसी ग्लोबल कंपनियों का कब्जा रहता है।
घरेलू फर्म्स को मजबूती देने की तैयारी
छोटी फर्म्स को बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए सक्षम बनाने हेतु ICAI 'कोलेबोरेटिव नेटवर्क' (Collaborative Network) की गाइडलाइंस पर काम कर रहा है। इसके जरिए स्वतंत्र भारतीय अकाउंटिंग फर्म्स बिना अपना अस्तित्व खोए, अपने रिसोर्सेज और टैलेंट को जोड़कर बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बोली लगा सकेंगी। यह कंसोर्टियम मॉडल अंतरराष्ट्रीय दिग्गजों से मुकाबला करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
एडवाइजरी सर्विस में प्राइवेट इक्विटी का रास्ता
रेगुलेटर, मिनिस्ट्री ऑफ कॉरपोरेट अफेयर्स (Ministry of Corporate Affairs) के साथ मिलकर Chartered Accountants Act में संशोधन पर चर्चा कर रहा है। इसके तहत फर्म्स अपनी नॉन-ऑडिट एडवाइजरी शाखाओं में प्राइवेट इक्विटी (PE) फंड जुटा सकेंगी। हालांकि, ऑडिट क्वालिटी को लेकर किसी भी समझौते से बचने के लिए 'ऑपरेशनल फायरवॉल' (Operational Firewall) लगाने का प्रस्ताव है, जिससे ऑडिट और कंसल्टेंसी का काम पूरी तरह अलग रहे।
निवेशकों के लिए आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इन बदलावों को किस रूप में स्वीकार करती है और इसका भारतीय प्रोफेशनल सर्विसेज मार्केट पर क्या असर पड़ता है।
