IBJA का बड़ा प्रस्ताव: सोने की पुरानी ज्वैलरी पर ज्वैलर्स को मिलेगा 1% तक का इंसेंटिव!

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AuthorMehul Desai|Published at:
IBJA का बड़ा प्रस्ताव: सोने की पुरानी ज्वैलरी पर ज्वैलर्स को मिलेगा 1% तक का इंसेंटिव!

इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) ने सरकार के सामने गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (Gold Monetisation Scheme) को फिर से चालू करने का एक नया प्लान पेश किया है। इस प्लान के तहत, ज्वैलर्स को ग्राहकों से पुरानी सोने की ज्वेलरी इकट्ठा करने पर **1%** तक का इंसेंटिव देने का प्रस्ताव है। इस कदम का मकसद घरों में रखे सोने को बाहर लाना और सोने के इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना है।

सोने की पुरानी ज्वेलरी का नया खेल!

IBJA ने सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम में बड़े बदलाव का सुझाव दिया है। इस प्रस्ताव का मुख्य हिस्सा यह है कि ग्राहकों से पुरानी सोने की ज्वेलरी जमा कराने पर ज्वैलर्स को उसके मूल्य का 1% तक इंसेंटिव मिलेगा। एसोसिएशन का मानना है कि ज्वैलर्स को कलेक्शन पॉइंट बनाने से स्कीम अपनी पिछली लॉजिस्टिकल दिक्कतों को दूर कर सकती है, जो 2015 में स्कीम शुरू होने के बाद से इसकी सफलता में बाधा बन रही थीं।

कैसे काम करेगा यह नया सिस्टम?

इस नए प्रस्ताव में, स्कीम का सारा ऑपरेशनल काम बैंकों की जगह अब रिटेल ज्वैलर्स संभालेंगे। ज्वैलर्स ग्राहकों से सोना लेंगे और उसे रिफाइनर तक पहुंचाने में मदद करेंगे, जिसके बदले उन्हें कमीशन मिलेगा। बैंक अब भी डिपॉजिट और क्रेडिट का काम देखेंगे, लेकिन कलेक्शन का फ्रंट-एंड काम ज्वैलर्स के हाथों में होगा। IBJA का मानना है कि सोने के मालिकों से जुड़ने का यह सबसे असरदार तरीका है। रिटेल आउटलेट्स में स्कीम को लाने से इंडस्ट्री को उम्मीद है कि वे ज्वैलर्स के भरोसे और दशकों से बने कस्टमर रिलेशनशिप का फायदा उठा पाएंगे।

सेंको गोल्ड (Senco Gold) जैसी बड़ी ज्वैलरी रिटेल कंपनियों के लिए, यह एक नई सर्विस ऑफर की तरह हो सकता है। हालांकि, मुख्य लक्ष्य घरों में रखे बेकार पड़े सोने को मोबीलाइज़ करना और सोने के महंगे इंपोर्ट पर देश की निर्भरता कम करना है, लेकिन यह सिस्टम रिटेल शोरूम में ग्राहकों की फुटफॉल भी बढ़ा सकता है। अगर यह लागू होता है, तो ज्वैलर्स उस रीसाइक्लिंग मार्केट का हिस्सा बन पाएंगे जिस पर फिलहाल छोटे, अनऑर्गनाइज्ड प्लेयर्स का दबदबा है।

चुनौतियां और रिस्क

हालांकि यह प्रस्ताव सोने की रीसाइक्लिंग को आसान बनाने का वादा करता है, लेकिन कुछ चीजें इंडस्ट्री के कंट्रोल से बाहर हैं। सबसे बड़ी रुकावट यह है कि लोग अभी भी सोना जमा करने के टैक्स असर को लेकर हिचकिचाते हैं। कई लोगों को डर है कि पुराना सोना घोषित करने या जमा करने से उनकी संपत्ति के स्रोत के बारे में पूछताछ हो सकती है या टैक्स की जांच बढ़ सकती है। इसके अलावा, विरासत में मिली ज्वेलरी से जुड़ा भावनात्मक लगाव भी ग्राहकों को आसानी से सोना पिघलवाने से रोकता है, चाहे कितना भी बड़ा फाइनेंशियल इंसेंटिव क्यों न मिले।

निवेशकों को यह भी ध्यान देना चाहिए कि यह अभी सिर्फ एक पॉलिसी प्रस्ताव है। अगस्त 2026 तक, सरकार की ओर से इसे लागू करने की कोई ऑफिशियल नोटिफिकेशन या टाइमलाइन जारी नहीं की गई है। IBJA के लीडरशिप ने बताया है कि मौजूदा राजनीतिक और आर्थिक माहौल में देरी हो सकती है, और सरकार और रेगुलेटरी बॉडीज द्वारा इस प्रस्ताव की गहन समीक्षा के बाद ही इसे लागू किया जा सकेगा। इसलिए, भले ही यह प्रस्ताव सोने को घरेलू स्तर पर मोबीलाइज़ करने की पुरानी समस्या को हल करने का लक्ष्य रखता है, लेकिन ज्वैलरी कंपनियों के फाइनेंशियल परफॉर्मेंस पर इसका असली असर पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि इसे रेगुलेटरी मंजूरी मिलती है या नहीं और सरकार जनता की टैक्स और पारदर्शिता संबंधी चिंताओं को कितनी प्रभावी ढंग से दूर करती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.