होम लोन लेने वाले कई ग्राहक अक्सर हैरान होते हैं कि समान क्रेडिट प्रोफाइल होने के बावजूद उनकी ब्याज दरें अलग क्यों हैं। यह अंतर RBI के रेपो रेट के कारण नहीं, बल्कि बैंकों द्वारा तय किए जाने वाले 'स्प्रेड' (Spread) के कारण होता है। अगस्त 2026 में जारी RBI के नए ड्राफ्ट नियमों के बाद पारदर्शिता पर जोर दिया जा रहा है।
बहुत से लोग मानते हैं कि अगर Reserve Bank of India (RBI) का रेपो रेट एक है, तो सभी बैंकों के लोन रेट भी एक समान होने चाहिए। लेकिन असलियत में, एक ही बैंक में दो ग्राहकों के लिए ब्याज दरें अलग-अलग हो सकती हैं। इसकी मुख्य वजह है—बैंक का 'स्प्रेड'।\n\n### क्या है ये 'स्प्रेड' का खेल?\nहर फ्लोटिंग-रेट होम लोन का फॉर्मूला होता है: एक्सटर्नल बेंचमार्क रेट + बैंक स्प्रेड। बेंचमार्क रेट तो सबके लिए एक जैसा होता है, लेकिन स्प्रेड पूरी तरह बैंक के हाथ में होता है। बैंक इसे अपना प्रॉफिट मार्जिन सुरक्षित करने और लोन के रिस्क को देखते हुए तय करते हैं।\n\n### ब्याज दरें क्यों बदलती हैं?\nसिर्फ सिबिल (CIBIL) स्कोर ही काफी नहीं है। बैंक कई चीजों को तौलते हैं:\n\n* LTV (Loan-to-Value) रेशियो: प्रॉपर्टी की वैल्यू के मुकाबले आप कितना लोन ले रहे हैं। अगर लोन ज्यादा है, तो रिस्क ज्यादा है, जिसका मतलब है हायर इंटरेस्ट रेट।\n* रोजगार की श्रेणी: आपकी इनकम कितनी स्टेबल है, आप सैलरीड हैं या सेल्फ-एम्प्लॉयड, यह सब स्प्रेड को प्रभावित करता है।\n* लोन का समय: दो साल पहले जो स्प्रेड तय हुआ था, हो सकता है आज बैंक की पॉलिसी उससे बेहतर हो। पुराने ग्राहकों के लिए अक्सर स्प्रेड स्ट्रक्चर पुराना ही रहता है, जबकि नए ग्राहकों को बेहतर डील मिल जाती है।\n\n### RBI का नया रुख\nअगस्त 2026 में रेगुलेटर ने ड्राफ्ट गाइडलाइन्स जारी की हैं ताकि लोन की प्राइसिंग में पारदर्शिता आ सके। इसका मकसद बैंकों की मनमानी को रोकना है। निवेशकों और लोन लेने वालों के लिए सलाह यही है कि सिर्फ रेपो रेट न देखें, बल्कि बैंक द्वारा वसूले जा रहे उस 'स्प्रेड' को नेगोशिएट (Negotiate) करना सीखें।\n\nअगर आपकी ब्याज दर मार्केट से बहुत ज्यादा है, तो आप हमेशा बैलेंस ट्रांसफर (Balance Transfer) का विकल्प चुन सकते हैं या अपने बेहतर क्रेडिट स्कोर का हवाला देकर बैंक से स्प्रेड कम करने की मांग कर सकते हैं।
