Indian Inc: अगले 2 साल तक नहीं मिलेगी राहत, कर्ज लेना रहेगा महंगा

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Indian Inc: अगले 2 साल तक नहीं मिलेगी राहत, कर्ज लेना रहेगा महंगा

भारतीय कंपनियों के लिए आने वाला समय चुनौतीपूर्ण रहने वाला है। फंडिंग की मांग बढ़ने और डिपॉजिट ग्रोथ धीमी होने के कारण ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं। जून 2026 तक प्राइवेट सेक्टर बैंक बरोइंग में **21.1%** का उछाल देखा गया है, जो कॉर्पोरेट मुनाफे पर सीधा दबाव डालेगा।

भारतीय कंपनियों के लिए फंड जुटाना अब और महंगा होने वाला है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, जून 2026 तक प्राइवेट कॉर्पोरेट सेक्टर की बैंक बरोइंग में 21.1% की जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। इसका मुख्य कारण कंपनियों की वर्किंग कैपिटल की बढ़ती जरूरतें और महंगाई है। India Ratings and Research ने पहले ही चेतावनी दी है कि मौजूदा हालात को देखते हुए फाइनेंशियल ईयर 2027 तक ब्याज दरों में नरमी की उम्मीद कम है।

मुनाफे पर क्या होगा असर?

निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता कॉर्पोरेट मार्जिन को लेकर है। जिन कंपनियों पर कर्ज का बोझ ज्यादा है, उनके मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाएगा। खास तौर पर मैन्युफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल सेक्टर, जो अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए बैंक क्रेडिट पर निर्भर हैं, उन्हें सबसे ज्यादा मार झेलनी पड़ सकती है।

बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का संकट

जून 2026 तक बैंक क्रेडिट ग्रोथ 16.5% रही, लेकिन डिपॉजिट उस रफ्तार से नहीं बढ़ पाए। इस असंतुलन की वजह से लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो 83.6% तक पहुंच गया है। बैंकों के पास फंड की कमी को पूरा करने के लिए अब सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट जैसे महंगे विकल्पों का सहारा लेना पड़ रहा है। जाहिर है, बैंक अपनी प्रॉफिटेबिलिटी बचाने के लिए ग्राहकों से अधिक ब्याज दरें वसूलना जारी रखेंगे।

NBFCs के लिए बढ़ी मुश्किलें

फाइनेंशियल सेक्टर में अब एक स्पष्ट विभाजन दिख रहा है। बाजार का भरोसा उन्हीं कंपनियों पर है जिनकी रेटिंग अच्छी है और जिनके पास स्टेबल कैश फ्लो है। वहीं, 'A' रेटिंग से नीचे वाली NBFCs के लिए फंड जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। इन कंपनियों के लिए कैपिटल की लागत बढ़ रही है और आने वाले समय में उनकी वैल्यूएशन में भी बदलाव देखने को मिल सकता है।

ग्लोबल संकेत और आगे की राह

ग्लोबल मार्केट में जियोपॉलिटिकल तनाव और कच्चे तेल (Brent Crude) के भाव $92 प्रति बैरल से ऊपर बने रहना महंगाई की चिंताओं को हवा दे रहे हैं। इसका असर बॉन्ड यील्ड पर पड़ रहा है। निवेशकों को सलाह है कि वे कंपनियों के डेट-टू-इक्विटी रेशियो और कैश फ्लो पर बारीकी से नजर रखें। जो कंपनियां बिना महंगे कर्ज के अपनी वर्किंग कैपिटल को बेहतर तरीके से मैनेज करेंगी, वही इस दौर में लंबी रेस की घोड़ी साबित होंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.