देश की हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां IRDAI से नए एक्सपेंस और कमीशन नियमों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश की मांग कर रही हैं। स्टैंडअलोन हेल्थ प्रोवाइडर्स को डर है कि नए नियमों से उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत के हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में फिलहाल एक बड़ा मंथन चल रहा है। कंपनियां IRDAI के साथ मिलकर डिस्ट्रीब्यूशन और एक्सपेंस-मैनेजमेंट फ्रेमवर्क में होने वाले बदलावों पर चर्चा कर रही हैं। 31 अक्टूबर, 2026 को कंसल्टेशन पीरियड खत्म होने के बाद अब इंडस्ट्री को फाइनल गाइडलाइंस का इंतजार है, जो आने वाले समय में कंपनियों के ऑपरेटिंग खर्चों और रिपोर्टिंग तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल सकती हैं।
मल्टी-ईयर पॉलिसी पर फंसा पेंच
सबसे बड़ी चिंता मल्टी-ईयर हेल्थ इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स को लेकर है। कंपनियां रेगुलेटर से यह साफ करने को कह रही हैं कि क्या ऐसी पॉलिसी के बाद के वर्षों को 'फ्रेश बिजनेस' माना जाए या 'रिन्यूअल'। वर्तमान स्थिति में अकाउंटिंग में घर्षण (friction) पैदा हो रहा है, क्योंकि कंपनियों को अपफ्रंट कमीशन और लंबे समय के लिए डिफ़र्ड अकाउंटिंग के बीच संतुलन बनाने में दिक्कत आ रही है। Star Health जैसी कंपनियां, जिनके पोर्टफोलियो में ऐसे प्रोडक्ट्स की संख्या ज्यादा है, उनके लिए यह स्पष्टता बेहद जरूरी है।
एक्सपेंस-ऑफ-मैनेजमेंट (EoM) का विवाद
रेगुलेटर का नया प्रस्ताव है कि एक्सपेंस लिमिट को 5 साल में 20% और 2 साल के भीतर 25% तक लाया जाए। स्टैंडअलोन हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों का तर्क है कि 'वन-साइज-फिट्स-ऑल' मॉडल उनके बिजनेस मॉडल के अनुकूल नहीं है। उनका मानना है कि मोटर थर्ड-पार्टी, क्रॉप इंश्योरेंस और सरकारी योजनाओं को EoM गणना से बाहर रखा जाना चाहिए, क्योंकि इनमें बिचौलियों का रोल कम होता है। कंपनियों को डर है कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो बड़े जनरल इंश्योरेंस खिलाड़ियों के मुकाबले उनकी प्रतिस्पर्धी स्थिति कमजोर हो सकती है।
निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
रेगुलेटर के पास अब तक 650 से ज्यादा सुझाव पहुंच चुके हैं। फिलहाल चर्चा इस बात पर है कि ग्रॉस डायरेक्ट प्रीमियम इनकम के आधार पर EoM की गणना कैसे की जाए। अगर रेगुलेटर कंपनियों की मांगों को नहीं मानता है, तो इंटरमीडियरी रेवेन्यू और प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ सकता है। अप्रैल 2027 से इन नए नियमों के प्रभावी होने की उम्मीद है, जिस पर बाजार की पैनी नजर बनी हुई है।
