HSBC का कमाल! NRI डिपॉजिट पर ₹45,000 करोड़ का लोन देकर बटोरे ₹5.5 अरब

BANKINGFINANCE
Whalesbook Logo
AuthorNeha Patil|Published at:
HSBC का कमाल! NRI डिपॉजिट पर ₹45,000 करोड़ का लोन देकर बटोरे ₹5.5 अरब

HSBC ने खास RBI विंडो का फायदा उठाकर नॉन-रेजिडेंट इंडियन (NRI) से करीब $5.5 अरब (लगभग ₹45,000 करोड़) की डिपॉजिट जुटाई हैं। बैंक इन डिपॉजिट्स पर भारी-भरकम लोन की सुविधा दे रहा है, जो इसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वियों से आगे रखता है।

Detailed Coverage

RBI के इस खास विंडो का कमाल

HSBC होल्डिंग्स पीएलसी ने अपनी नॉन-रेजिडेंट इंडियन (NRI) डिपॉजिट को तेजी से बढ़ाया है। कंपनी ने फॉरेन करेंसी डिपॉजिट के साथ-साथ बड़ी लोन की सुविधा देकर करीब $5.5 अरब (लगभग ₹45,000 करोड़) जुटाए हैं। बैंक की यह स्ट्रैटेजी उसे दुनिया भर के दूसरे बैंकों से अलग करती है, क्योंकि वह भारत के गिफ्ट सिटी, सिंगापुर, हांगकांग और दुबई जैसे अहम वित्तीय केंद्रों में अपनी मौजूदगी का फायदा उठा रहा है।

RBI की कंसेशनल विंडो का असर

बैंक की रणनीति भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की एक विशेष विंडो पर केंद्रित है। यह विंडो बैंकों को फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (FCNR) डिपॉजिट्स के बदले क्रेडिट देने की अनुमति देती है। इस स्ट्रक्चर के तहत, HSBC ने ग्राहकों को अपनी डिपॉजिट्स के मुकाबले काफी ज्यादा लोन लेने की सुविधा दी है। उदाहरण के लिए, ₹100,000 की पांच साल की डिपॉजिट पर, बैंक $1.9 मिलियन (लगभग ₹15.8 करोड़) तक का लोन देने की इजाजत दे रहा है। लोन पर 5.05% से 5.15% का ब्याज दर तय करके, बैंक डिपॉजिटर्स के लिए लगभग 14.25% का आकर्षक सालाना रिटर्न देने वाला स्ट्रक्चर तैयार कर रहा है।

ग्लोबल प्रतिद्वंद्वियों से तुलना

यह हाई-लिवरेज (ज्यादा लीवरेज) वाला तरीका दूसरे ग्लोबल बैंकों से बिल्कुल अलग है जो डायस्पोरा वेल्थ को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक पीएलसी ने इसी तरह के डिपॉजिट प्रोडक्ट्स से लगभग $1 अरब (लगभग ₹8,300 करोड़) जुटाए हैं। स्टैंडर्ड चार्टर्ड ने जहां डिपॉजिट राशि का लगभग नौ गुना लोन देने का रूढ़िवादी तरीका अपनाया है, वहीं HSBC ने इसे बढ़ाकर 19 गुना तक कर दिया है। यह अंतर HSBC की आक्रामक रणनीति को दिखाता है, जिसका मकसद बड़े NRI बैंकिंग सेगमेंट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना है।

जोखिम और निवेशक क्या देखें?

निवेशकों और बाजार पर नजर रखने वालों के लिए, इस आक्रामक लीवरेज स्ट्रैटेजी की स्थिरता सबसे अहम सवाल है। हालांकि मौजूदा इनफ्लो (पैसा आना) यह बताता है कि यह ग्राहकों को आकर्षित करने में सफल है, लेकिन यह मॉडल RBI की कंसेशनल विंडो की उपलब्धता और शर्तों पर निर्भर करता है। अगर भविष्य में रेगुलेटरी बदलाव होते हैं या RBI इन स्वैप रेट्स को मैनेज करने के तरीके में बदलाव करता है, तो ऐसे लीवरेज्ड प्रोडक्ट्स की प्रॉफिटेबिलिटी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, हाई लीवरेज पर बैंक की निर्भरता क्रेडिट रिस्क मैनेजमेंट की जरूरतें बढ़ाती है। अगर ब्याज दरें या करेंसी स्वैप मार्केट अस्थिर होते हैं, तो इन डिपॉजिट-प्लस-लोन प्रोडक्ट्स के मार्जिन पर दबाव आ सकता है। निवेशकों को कंपनी से भविष्य में अपने लोन बुक की क्वालिटी और इन पांच साल की डिपॉजिट प्रतिबद्धताओं के लॉन्ग-टर्म बैलेंस शीट इम्पैक्ट को मैनेज करने के तरीके के बारे में और जानकारी मिलने की उम्मीद होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.