देश की बड़ी हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग (HFT) कंपनियां टॉप इंजीनियरिंग टैलेंट को लुभाने के लिए रिकॉर्ड-तोड़ स्टाइपेंड दे रही हैं। एल्गोरिदम की रेस में कंपनियां करोड़ों लुटा रही हैं, लेकिन निवेशकों को बढ़ते खर्च और रेगुलेटरी दबाव पर नजर रखने की जरूरत है।
भारत में HFT फर्मों के बीच टैलेंट को लेकर एक ऐसी जंग छिड़ी है, जिसकी चर्चा हर तरफ है। Quadeye, Graviton Research Capital, IMC Trading और Optiver जैसी बड़ी कंपनियां समर इंटर्नशिप के लिए ₹30 लाख प्रति महीने तक का स्टाइपेंड दे रही हैं। 2 महीने की इंटर्नशिप के लिए ये पैकेज ₹50 लाख से ₹60 लाख के बीच बैठते हैं, जो कई पारंपरिक क्षेत्रों में सीनियर लेवल की सैलरी से भी ज्यादा है।
बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव
अब इन फर्मों को स्टॉक पिकिंग या फाइनेंशियल एनालिसिस करने वालों की तलाश नहीं है। इनका पूरा फोकस गणित, सांख्यिकी और प्रोग्रामिंग के जानकारों पर है। मकसद साफ है—मार्केट में पलक झपकते ही होने वाले हजारों ट्रेड से मुनाफा कमाना। इसके लिए उन्हें ऐसे इंजीनियर चाहिए जो माइक्रो-सेकंड्स में डेटा प्रोसेस कर सकें।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
यह टैलेंट वॉर तब छिड़ी है जब भारत के डेरिवेटिव्स मार्केट में सुस्ती दिख रही है। जुलाई में मार्केट टर्नओवर 27.1% घटकर ₹1.7 ट्रिलियन के निचले स्तर पर आ गया है। मार्केट में गिरते वॉल्यूम के बीच, ये कंपनियां मानती हैं कि कॉम्पिटिशन से एक कदम आगे रहना ही मुनाफे का एकमात्र रास्ता है।
रेगुलेटरी और फाइनेंशियल दबाव
इतनी भारी सैलरी के कारण फर्मों का फिक्स्ड कॉस्ट बढ़ रहा है, जो भविष्य में मार्जिन पर असर डाल सकता है। साथ ही, SEBI की बढ़ती सख्ती ने इन कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। उन्हें अपनी टेक्नोलॉजी को लगातार अपडेट रखना पड़ रहा है ताकि वे कड़े नियमों के दायरे में रहकर भी मुनाफा कमा सकें। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह भारी-भरकम खर्च इन कंपनियों को मार्केट में दबदबा बनाए रखने में मदद करेगा या मार्जिन पर दबाव बढ़ाएगा।
