HDFC Securities ने साफ कर दिया है कि **15 अक्टूबर 2026** से लागू होने वाले नए **0.02%** UPI शुल्क का उन पर असर न के बराबर होगा। कंपनी के **98%** ट्रांजैक्शंस बैंक-लिंक्ड अकाउंट्स के जरिए होते हैं, जिससे ब्रोकरेज इस नए नियम के दायरे से बाहर है।
सुरक्षित मॉडल का फायदा
HDFC Securities का बिजनेस मॉडल इसे UPI ट्रांजैक्शंस पर लगने वाले नए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से एक मजबूत कवच प्रदान करता है। ब्रोकरेज के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से अगस्त 2026 के बीच कुल 5.23 करोड़ ट्रांजैक्शंस किए गए, जिनमें से केवल 9.6 लाख ही UPI के माध्यम से थे। इसका मतलब साफ है कि 98% से ज्यादा ट्रांजैक्शंस पर इस नए शुल्क का कोई असर नहीं पड़ेगा।
क्या है नया नियम?
रेगुलेटरी अपडेट के अनुसार, कैपिटल मार्केट सेगमेंट में UPI ट्रांजैक्शंस पर 0.02% का चार्ज लगाया जाएगा, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 प्रति ट्रांजैक्शन तय की गई है। यह नियम स्टॉक ब्रोकर्स, म्यूचुअल फंड और अन्य सिक्योरिटी डीलर्स पर लागू होता है। HDFC Securities का '3-इन-1' अकाउंट स्ट्रक्चर उसे सीधे बैंक फंड ट्रांसफर की सुविधा देता है, जो UPI के दायरे में नहीं आते, जिससे कंपनी इस अतिरिक्त लागत से बच जाती है।
डिस्काउंट ब्रोकर्स के लिए चुनौती
बाजार में कई डिस्काउंट ब्रोकर्स ऐसे हैं जो अपने फंड ट्रांसफर के लिए काफी हद तक UPI पर निर्भर हैं। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, कुछ प्लेटफॉर्म्स अपने फंड का दो-तिहाई हिस्सा UPI के जरिए प्रोसेस करते हैं। इन कंपनियों के लिए 0.02% का शुल्क सीधा ऑपरेशनल कॉस्ट बन जाएगा। मुसीबत तब और बढ़ जाती है जब कोई क्लाइंट ट्रेडिंग अकाउंट में फंड तो डालता है, लेकिन ट्रेड नहीं करता, जिससे ब्रोकर को कोई कमाई नहीं होती पर पेमेंट चार्ज देना पड़ता है।
रेगुलेटर की क्या है स्थिति?
SEBI चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने स्पष्ट किया है कि रेगुलेटर ब्रोकर्स की चिंताओं को समझ रहा है और उन पर विचार किया जा रहा है। अब नजरें इस पर हैं कि क्या 15 अक्टूबर से पहले नियमों में कोई बदलाव होता है या ब्रोकर्स को खुद इन खर्चों को उठाना पड़ेगा। HDFC Securities फिलहाल इस मामले में अपने प्रतिद्वंदियों के मुकाबले काफी सुरक्षित स्थिति में है।
