HDFC Bank ने NCLT के उस आदेश के खिलाफ अपील करने का फैसला किया है, जिसमें Zee के फाउंडर Subhash Chandra के लिए एक कर्ज निपटान योजना को मंजूरी दी गई थी। इस योजना के तहत **₹22,006 करोड़** के दावों के बदले केवल **₹6.5 करोड़** का भुगतान तय किया गया है।
विवाद की जड़ क्या है?
NCLT के जिस फैसले को HDFC Bank और अन्य लेंडर्स चुनौती देने जा रहे हैं, उसमें ₹22,006.57 करोड़ के कुल दावों के मुकाबले केवल ₹6.5 करोड़ के भुगतान की मंजूरी दी गई है। यह रिकवरी रेट मात्र 0.03% है, जिसका सीधा मतलब है कि लेंडर्स को 99.9% से अधिक का नुकसान हो रहा है।
बैंकों को क्या हैं आपत्तियां?
इस मामले में कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं:
- वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल: बैंकों का आरोप है कि रेजोल्यूशन प्लान को मंजूरी देने वाली वोटिंग प्रक्रिया में ऐसे लोगों को शामिल किया गया जो कर्जदार के करीबी या संबंधित पक्ष (Related Parties) थे। नियमों के अनुसार, ऐसे लोगों को वोटिंग से दूर रहना चाहिए।
- नेटवर्थ में भारी गिरावट: बैंकों ने Subhash Chandra की नेटवर्थ में आई अचानक गिरावट पर भी सवाल उठाए हैं। कहा जा रहा है कि उनकी नेटवर्थ 2018 में ₹40,000 करोड़ से अधिक थी, जो अब घटकर मात्र ₹31.79 करोड़ रह गई है। लेंडर्स का मानना है कि इस पर फोरेंसिक ऑडिट जरूरी था।
आगे क्या होगा?
HDFC Bank के अलावा Axis Bank, Canara Bank, RBL Bank और Union Bank of India भी इस लड़ाई में शामिल हैं। लेंडर्स अब नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) का दरवाजा खटखटा रहे हैं। HDFC Bank का कुल एक्सपोजर इसमें 3.2% है। यह मामला भारत में पर्सनल इंसॉल्वेंसी के भविष्य के लिए एक बड़ा कानूनी प्रेसिडेंट बन सकता है। अब बाजार की नजर इस पर है कि NCLAT इस मामले को कब स्वीकार करता है और क्या वह NCLT के आदेश पर रोक लगाता है।
