HDFC Bank की साख एक मुश्किल दौर से गुजर रही है, खासकर बैंक के चेयरमैन Atanu Chakraborty के अचानक इस्तीफे और क्लाइंट्स को गलत उत्पाद बेचने के पुराने मामलों के खुलासे के बाद। Chakraborty ने अपने पद से इस्तीफे के पीछे 'नैतिक मतभेदों' और बैंक में 'आठ साल पुरानी परिचालन समस्याओं' के समाधान में हो रही देरी का हवाला दिया है। उनके इस फैसले ने शेयर बाजार को चौंका दिया है।
Chakraborty का इस्तीफा 18 मार्च 2026 को हुआ। उन्होंने कहा कि बैंक में 'कुछ ऐसी बातें और तौर-तरीके' थे जो उनके व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं थे। यह घटना बैंक के लिए चिंता का विषय बन गई है, खासकर तब जब यह क्रेडिट सुइस (Credit Suisse) के एडिशनल टियर-1 (AT-1) बॉन्ड की मिस-सेलिंग के आरोपों से जुड़ा है। इन आरोपों के चलते बैंक ने मार्च 2026 में तीन वरिष्ठ अधिकारियों को नौकरी से निकाल दिया था। आरोप है कि इन अधिकारियों ने दुबई और बहरीन स्थित अपनी शाखाओं के जरिए नॉन-रेजिडेंट इंडियन (NRI) क्लाइंट्स को ये हाई-रिस्क बॉन्ड गलत तरीके से बेचे थे।
इस खबर का असर शेयर बाजार पर साफ दिखा। 30 मार्च 2026 को HDFC Bank का शेयर 3% से ज्यादा गिरकर ₹731.80 पर बंद हुआ। इस गिरावट के साथ ही बैंक का मार्केट कैपिटलाइजेशन (Market Capitalization) लगभग ₹11.64 लाख करोड़ ($139.7 बिलियन USD) पर आ गया।
यह भी गौर करने वाली बात है कि HDFC Bank का मौजूदा प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो (TTM) करीब 15.66 है, जो इसके मुख्य प्रतिस्पर्धियों जैसे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के 10.72 और इंडियन बैंक के 10.05-10.38 के P/E से काफी ऊपर है। आमतौर पर, HDFC Bank को बेहतर गवर्नेंस और ग्रोथ के कारण प्रीमियम वैल्यूएशन मिलता रहा है, लेकिन इन घटनाओं से यह प्रीमियम सवालों के घेरे में आ गया है।
आठ साल तक AT-1 बॉन्ड मिस-सेलिंग के मामले को सुलझाने में हुई देरी गवर्नेंस पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। Chakraborty के इस्तीफे की चिट्ठी में 'कुछ ऐसी बातें और तौर-तरीके' का जिक्र, व्यक्तिगत गलतियों से कहीं बड़ी समस्याओं की ओर इशारा करता है। रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि चेयरमैन और सीईओ Sashidhar Jagdishan के बीच जवाबदेही और रणनीति को लेकर मतभेद थे, खासकर सीईओ की री-अपॉइंटमेंट को लेकर। बैंक भले ही मजबूत गवर्नेंस का दावा करे, लेकिन रेग्युलेटर की चेतावनी, आंतरिक जांच, अधिकारियों की बर्खास्तगी और चेयरमैन का यह अचानक जाना, यह सब संस्थागत निगरानी और नैतिक आचरण में खामियों की ओर इशारा करते हैं।
इस बीच, Jefferies और Macquarie जैसे बड़े ब्रोकरेज हाउस ने तो बैंक को अपनी 'बाय लिस्ट' से हटा दिया है। हालांकि, अभी भी विश्लेषकों का लॉन्ग-टर्म नजरिया पॉजिटिव बना हुआ है और वे 'आउटपरफॉर्म' रेटिंग दे रहे हैं। लेकिन, बैंक के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब अपनी गवर्नेंस को मजबूत करना, पिछली नैतिक खामियों को खुलकर सामने लाना और निवेशकों का भरोसा दोबारा जीतना होगा।