गवर्नेंस पर सवालिया निशान
27 मई 2026 को HDFC Bank के निवेशकों का भरोसा फिर से डगमगा गया, जब इंट्राडे ट्रेडिंग के दौरान बैंक के शेयर 2% से ज़्यादा गिर गए। इसकी वजह एक रिपोर्ट थी, जिसमें ₹45 करोड़ के भुगतान की अंदरूनी जांच का खुलासा हुआ। ये लेन-देन फाइनेंशियल ईयर 2024 और 2025 के बीच हुए थे और कथित तौर पर इन्हें रोड सेफ्टी कैम्पेन के लिए मार्केटिंग बजट के ज़रिए दिखाया गया था। अंदरूनी जांच के मुताबिक, ये भुगतान महाराष्ट्र स्टेट रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (MSRDC) को 'अलग ब्याज दर' देने का एक तरीका थे, जिससे भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के उन नियमों की अनदेखी हुई, जो अलग-अलग जमाकर्ताओं के लिए तय ब्याज दरों पर रोक लगाते हैं।
जवाबदेही और ऑपरेशनल जोखिम
मार्च 2026 में बोर्ड की ऑडिट कमेटी द्वारा शुरू की गई इस विजिलेंस प्रोब (vigilance probe) में 10 से ज़्यादा वरिष्ठ अधिकारियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है। इनमें MD & CEO शशिधर जगदीशन, CFO श्रीनिवासन वैद्यनाथन और चीफ मार्केटिंग ऑफिसर रवि सन्थानम शामिल हैं। जांच में सामने आए बयानों के अनुसार, वरिष्ठ नेतृत्व इन भुगतानों को संरचित करने के लिए चर्चाओं में शामिल था, लेकिन इसके लिए कोई औपचारिक दस्तावेज़ या मानक कंप्लायंस रिव्यू नहीं किया गया था। हालांकि, बैंक ने इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है और कहा है कि उनकी आंतरिक प्रक्रियाएं मजबूत हैं और सभी मामले स्थापित नियमों के अनुसार ही निपटाए जाते हैं।
भरोसे की कीमत
एक ऐसे संस्थान के लिए जो अपनी सख्त गवर्नेंस और कंप्लायंस के लिए जाना जाता है, ये घटनाक्रम एक बड़ा झटका है। यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब इसी साल मार्च 2026 में पूर्व पार्ट-टाइम चेयरमैन अ تنو चक्रवर्ती ने बैंक के तौर-तरीकों और उनके निजी मूल्यों में तालमेल न होने का हवाला देते हुए अचानक इस्तीफा दे दिया था। इन घटनाओं के मिले-जुले असर से एक 'ट्रस्ट डिस्काउंट' (trust discount) पैदा हो गया है, जिसके चलते बैंक का शेयर पूरे साल बाज़ार के बड़े इंडेक्स और दूसरे प्राइवेट बैंकों के मुकाबले कमजोर प्रदर्शन कर रहा है। बाज़ार के प्रतिभागी अब इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या ये गवर्नेंस संबंधी चिंताएं गहरी प्रणालीगत कमजोरियों को दर्शाती हैं या ये महज़ कुछ ऑपरेशनल गलतियां हैं।
बाज़ार का नज़रिया और वैल्यूएशन
गवर्नेंस से जुड़े हंगामे के बावजूद, बैंक के हालिया Q4 FY26 नतीजों में 9.11% की साल-दर-साल मज़बूत प्रॉफिट ग्रोथ दिखी है, जो कम क्रेडिट कॉस्ट और बेहतर एसेट क्वालिटी का नतीजा है। लेकिन, बाज़ार की प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से हेडलाइन प्रॉफिट के बजाय संस्थागत स्पष्टता को प्राथमिकता दे रही है। शेयर का P/E रेश्यो करीब 14.9–15.1x पर कारोबार कर रहा है, जिसका मतलब है कि पिछले दो सालों में वैल्यूएशन मल्टीपल्स (valuation multiples) काफी कम हुए हैं। भले ही यह संस्था भारतीय वित्तीय क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति बनी हुई है, लेकिन गवर्नेंस संबंधी इन कहानियों के बने रहने से यह संकेत मिलता है कि जब तक बैंक नियामकों के सामने अपना रिकॉर्ड साफ नहीं कर लेता और निवेशकों का भरोसा दोबारा हासिल नहीं कर लेता, तब तक शेयर में कंसॉलिडेशन (consolidation) का दौर जारी रह सकता है।
