डिपॉजिट कंट्रोल को मजबूत कर रहा HDFC Bank
HDFC Bank ने डायरेक्ट सेलिंग एसोसिएट्स (DSAs) और बाहरी एजेंटों के जरिए सरकारी संस्थानों से डिपॉजिट लेने की रणनीति को खत्म करने का फैसला किया है। अब बैंक सिर्फ अपने इंटरनल ब्रांच नेटवर्क पर ही भरोसा करेगा। बैंक का कहना है कि यह एक ऑपरेशनल बदलाव है, जो उसके 9,600 से ज्यादा ब्रांचों के विशाल नेटवर्क को देखते हुए किया गया है। लेकिन, इस कदम से बैंकिंग सेक्टर में पारदर्शिता बढ़ेगी, खासकर सरकारी संस्थाओं के साथ होने वाले डील्स में।
MSRDC का मामला और रेगुलेटरी नकेल
इस पॉलिसी में बदलाव का समय अहम है। हाल ही में महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम (MSRDC) को ₹45 करोड़ के इंसेंटिव पेमेंट को लेकर काफी बवाल हुआ था। रेगुलेटर्स इस बात से चिंतित हैं कि सरकारी निकायों से डिपॉजिट लेने के लिए एजेंटों को कमीशन देना हितों के टकराव (Conflict of Interest) को जन्म दे सकता है। HDFC Bank इस कदम से किसी भी संभावित रेगुलेटरी जांच के नतीजों को पहले ही न्यूट्रलाइज करने की कोशिश कर रहा है, ताकि आगे चलकर कोई सख़्त नियम न आए।
कॉम्पिटिशन और सेक्टर में बदलाव
ICICI Bank और Axis Bank जैसे दूसरे बड़े बैंकों के मुकाबले HDFC Bank की यह रणनीति अलग है। जहां कई प्राइवेट बैंक टियर-2 और टियर-3 शहरों में पकड़ बनाने के लिए एजेंट नेटवर्क पर निर्भर थे, वहीं अब यह नेटवर्क रेगुलेटरी परेशानी का सबब बन गया है। कॉम्पिटिटर्स भी अब डिजिटल, डायरेक्ट और ब्रांच-आधारित मॉडल पर जोर दे रहे हैं, ताकि CASA (Current Account Savings Account) रेश्यो को बेहतर बनाया जा सके। खासकर सरकारी खातों के लिए थर्ड-पार्टी इंटरमीडियरीज पर निर्भरता RBI की जांच को न्योता दे सकती है।
मार्जिन पर क्या होगा असर?
थर्ड-पार्टी एजेंटों को हटाने से बैंक को बड़े और स्थिर सरकारी डिपॉजिट जुटाने में शुरुआती दिक्कतें आ सकती हैं। हो सकता है कि इंटरनल स्टाफ के पास एजेंटों जैसा लोकल नेटवर्क न हो, जिससे डिपॉजिट ग्रोथ थोड़ी धीमी पड़ सकती है। अगर सरकारी संस्थाएं उन बैंकों के पास चली गईं जो अभी भी ऐसे एजेंटों के साथ काम करते हैं, तो HDFC Bank के CASA ग्रोथ पर दबाव आ सकता है। बैंक की यह नई रणनीति कितनी सफल होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपने विशाल ब्रांच नेटवर्क का इस्तेमाल करके पुराने एजेंटों वाले फायदे बिना कमीशन खर्च के कैसे हासिल कर पाता है।
