बैंक के लिए यह एक बड़ा झटका है। Atanu Chakraborty के अचानक इस्तीफे के बाद HDFC Bank ने कहा है कि वह इस मामले की जांच के लिए अंतरराष्ट्रीय और घरेलू ऑडिटर्स की नियुक्ति कर रहा है। बैंक ने यह भी साफ किया कि चेयरमैन ने इस्तीफे के जो कारण बताए हैं, वे पहले बैंक को नहीं बताए गए थे, जिससे मामले में और भी रहस्य बढ़ गया है।
इस घटनाक्रम का असर बाजार पर तुरंत दिखा। ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म HSBC ने HDFC Bank की रेटिंग को 'Buy' से घटाकर 'Hold' कर दिया है और टारगेट प्राइस में 12% की कटौती की है। फर्म का मानना है कि यह इस्तीफा एक गंभीर गवर्नेंस (Governance) चिंता का विषय है, जिससे निवेशकों का भरोसा कम हो सकता है और भविष्य की योजनाओं में देरी हो सकती है।
हालांकि, कुछ एनालिस्ट्स (Analysts) इस गिरावट को खरीदारी का मौका मान रहे हैं। Equinomics Research के फाउंडर और एमडी G Chokkalingam का कहना है कि स्टॉक अभी भी आकर्षक वैल्यू (Attractive Value) पर ट्रेड कर रहा है। उनके कैलकुलेशन के अनुसार, अगर HDFC Life Insurance और HDFC ERGO में बैंक की हिस्सेदारी की वैल्यू हटा दी जाए, तो बैंक के कोर लेंडिंग बिजनेस का वैल्यूएशन उसके अनुमानित फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY2026) के एडजस्टेड बुक वैल्यू का सिर्फ 1.7 गुना रह जाता है। Chokkalingam को उम्मीद है कि कोर लेंडिंग में तेजी आएगी और सहायक कंपनियों का प्रदर्शन भी बेहतर होगा।
फिलहाल, ₹4.50 ट्रिलियन मार्केट कैप वाली HDFC Bank का TTM P/E रेश्यो 22.5x है। यह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के करीब 12x P/E और ICICI Bank के करीब 18x P/E से थोड़ा ज्यादा है। बाजार हमेशा से HDFC Bank को उसकी मजबूत मार्केट पोजिशन के कारण प्रीमियम वैल्यू देता आया है। अतीत में, HDFC Bank में बड़े एग्जीक्यूटिव (Executive) के बाहर जाने से शेयर में अक्सर 3-5% की छोटी गिरावट देखी गई है, ऐसे में 12% की यह बड़ी गिरावट ज्यादा मायने रखती है।
Atanu Chakraborty का 'नैतिक मतभेद' जैसे अस्पष्ट कारणों से इस्तीफा देना और बैंक का यह कहना कि उन्हें उनके कारणों की जानकारी नहीं थी, यह गवर्नेंस से जुड़े बड़े जोखिम (Governance Risks) की ओर इशारा करता है। यह अनिश्चितता निवेशकों के भरोसे को कम कर सकती है और ऐसे संकेत दे सकती है कि बैंक के अंदर जोखिम प्रबंधन (Risk Management) या डिस्क्लोजर नियमों (Disclosure Rules) जैसे अहम मुद्दों पर आंतरिक मतभेद हो सकते हैं। HSBC द्वारा 'गवर्नेंस ओवरहैंग' (Governance Overhang) का जिक्र इसी चिंता को दिखाता है कि अनिश्चितता लंबी चलने पर भविष्य की योजनाओं और टॉप टैलेंट को आकर्षित करने की क्षमता पर असर डाल सकती है।
भले ही HDFC Bank की फाइनेंशियल हेल्थ मजबूत हो, लेकिन उसके ऊंचे वैल्यूएशन के लिए मजबूत गवर्नेंस का होना जरूरी है, जिस पर अब सवाल उठ रहे हैं। अगर गवर्नेंस के मुद्दे बढ़ते हैं, तो यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जैसे रेगुलेटर (Regulator) का ध्यान खींच सकता है, जिससे बैंक पर सख्त नियम लागू हो सकते हैं।
एक ओर जहां G Chokkalingam जैसे विश्लेषक स्टॉक में वैल्यू देख रहे हैं, वहीं HSBC का 'Hold' रेटिंग और घटाया गया टारगेट प्राइस यह दिखाता है कि बड़े संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) की राय फिलहाल थोड़ी सतर्क है। आने वाले दिनों में HDFC Bank इस गवर्नेंस मुद्दे से कैसे निपटता है और अपने लेंडिंग और सब्सिडियरी (Subsidiary) बिजनेस में कैसा प्रदर्शन दिखाता है, यह निवेशकों का भरोसा वापस जीतने और शेयर की कीमत को सहारा देने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
