HDFC Bank ने विदेशी मुद्रा अनिवासी (FCNR) डिपॉजिट्स पर ब्याज दरों में भारी बढ़ोतरी की है। अब 3 से 5 साल की अवधि वाले डिपॉजिट्स पर **6%** का आकर्षक ब्याज मिलेगा, जो पहले सिर्फ **3.65%** था। यह कदम एनआरआई (NRI) पूंजी को आकर्षित करने के लिए उठाया गया है, क्योंकि हाल ही में एफवाई26 में ऐसे निवेश में बड़ी गिरावट देखी गई थी।
क्या है पूरा मामला?
HDFC Bank ने अपने फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (FCNR) डिपॉजिट्स के लिए इंटरेस्ट रेट्स में जबरदस्त इजाफा किया है। बैंक अब 3 से 5 साल तक की अवधि वाले डिपॉजिट्स पर 6% का ब्याज दे रहा है। यह पिछली दर 3.65% से 235 बेसिस पॉइंट की बड़ी छलांग है। नई दरें 10 जून 2026 से लागू हो गई हैं।
क्यों आया ब्याज दरों में उछाल?
बैंकों के लिए एनआरआई (NRI) डिपॉजिट्स में कमी देखी जा रही है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, फाइनेंशियल ईयर 2026 में FCNR(B) इनफ्लो घटकर सिर्फ $946 मिलियन रह गया, जबकि फाइनेंशियल ईयर 2025 में यह $7 बिलियन था। ऐसे में, 6% का रिटर्न ऑफर करके HDFC Bank इस ट्रेंड को पलटने और सिस्टम में ज्यादा फॉरेन करेंसी लिक्विडिटी लाने की कोशिश कर रहा है।
RBI की क्या है मदद?
इस फैसले के पीछे RBI की कंसेशनल स्वैप फैसिलिटी (concessional swap facility) एक बड़ी वजह है, जो 30 सितंबर 2026 तक बैंकों के लिए उपलब्ध है। आम तौर पर, फॉरेन करेंसी डिपॉजिट पर 6% ब्याज देना बैंक के लिए काफी महंगा सौदा होता है, क्योंकि उन्हें करेंसी में उतार-चढ़ाव के रिस्क (हेजिंग कॉस्ट) को भी मैनेज करना पड़ता है। RBI की यह सुविधा असल में हेजिंग कॉस्ट को कवर करती है, जिससे बैंक के लिए इतने ऊंचे रेट्स देना मुनाफे पर सीधा असर डाले बिना संभव हो जाता है।
कॉम्पिटिशन में HDFC Bank आगे
HDFC Bank का यह कदम उसे बाकी बड़े बैंकों से काफी आगे खड़ा करता है। फिलहाल, ज्यादातर बड़े प्राइवेट और सरकारी बैंक 3% से 3.4% के आसपास ही ब्याज दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ बड़ौदा 3.35%, कोटक महिंद्रा बैंक 3.4%, जबकि ICICI Bank और Axis Bank क्रमश: 3% और 3.25% की पेशकश कर रहे हैं। यह बड़ा अंतर दिखाता है कि HDFC Bank फिलहाल शॉर्ट-टर्म में कॉम्पिटिटिव पैरिटी बनाए रखने से ज्यादा, तेजी से अपनी फॉरेन करेंसी डिपॉजिट बेस बढ़ाने पर जोर दे रहा है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह होगी कि RBI की स्वैप फैसिलिटी की डेडलाइन (30 सितंबर 2026) के बाद बैंक की यह स्ट्रैटेजी कितनी टिकाऊ रहती है। अगर इस सपोर्ट के खत्म होने के बाद भी बैंक ऊंचे रेट्स देता रहता है, तो उसके नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव पड़ सकता है। निवेशक आगे की अर्निंग कॉल्स में मैनेजमेंट से इस कैंपेन की सफलता और फंड जुटाने की क्षमता के बारे में जानकारी ले सकते हैं। साथ ही, यह भी देखना होगा कि क्या बैंक बाजार की बदलती परिस्थितियों के अनुसार इन रेट्स में बदलाव करता है। बैंक के डिपॉजिट मिक्स में यह बदलाव और इन फंड्स को प्रभावी ढंग से तैनात करने की उसकी क्षमता, इस फैसले के लॉन्ग-टर्म इम्पैक्ट के लिए अहम साबित होगी।
