HDFC Bank ने 3 से 5 साल की डॉलर जमा (Dollar Deposits) पर अपनी ब्याज दरें बढ़ाकर **6.25%** कर दी हैं। यह कदम भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की विशेष स्वैप विंडो (Swap Window) बंद होने से ठीक पहले उठाया गया है। इससे बैंक विदेशी मुद्रा लिक्विडिटी (Foreign Currency Liquidity) आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है, और कई अन्य बैंक भी सितंबर की डेडलाइन से पहले विदेशी रिजर्व बढ़ाने की होड़ में शामिल हैं।
विदेशी मुद्रा के लिए लगी होड़
RBI की स्वैप विंडो के अंतिम दो महीने बचे होने के कारण बैंकिंग सेक्टर में विदेशी मुद्रा को आकर्षित करने की रेस तेज हो गई है। ये जमा राशियां बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा का एक महत्वपूर्ण स्रोत होती हैं। इसी कड़ी में, HDFC Bank ने 1 अगस्त, 2026 से लागू होने वाली 3 से 5 साल की फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) डॉलर जमा पर ब्याज दर को पिछले 6% से बढ़ाकर 6.25% कर दिया है। यह बढ़ोतरी 25 बेसिस पॉइंट की है।
निजी क्षेत्र के अन्य प्रमुख बैंक भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। ICICI Bank और Axis Bank वर्तमान में समान डॉलर-डिनॉमिनेटेड FCNR(B) जमा पर 6% की दर की पेशकश कर रहे हैं। वहीं, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने $1 मिलियन से अधिक की जमा राशि पर 5 साल की FCNR(B) दर 6% निर्धारित की है।
छोटे बैंक बाजार हिस्सेदारी हासिल करने के लिए और भी ऊंची दरें दे रहे हैं। AU Small Finance Bank ने हाल ही में 3 से 4 साल की अवधि के लिए FCNR(B) जमा पर अपनी अधिकतम दर 7.4% तक बढ़ाई है, साथ ही कुछ विशेष अवधियों के लिए नॉन-रेजिडेंट एक्सटर्नल फिक्स्ड डिपॉजिट पर भी दरें 7.6% तक कर दी हैं।
बैंक क्यों बढ़ा रहे हैं जमा दरें?
बैंकों को RBI की कंसेशनल स्वैप फैसिलिटी से प्रेरणा मिल रही है, जो विदेशी मुद्रा लिक्विडिटी प्रबंधन में काफी सफल रही है। 31 जुलाई, 2026 तक, बैंकों ने इस पहल के तहत लगभग $41 बिलियन विदेशी मुद्रा जुटाई थी। इसमें से $36.7 बिलियन FCNR(B) जमा से आए, जबकि बाकी विदेशी उधारी और एक्सटर्नल कमर्शियल बोरिंग्स (ECBs) से थे। यह राशि 2013 में RBI की ऐसी ही स्वैप स्कीम के दौरान जुटाए गए $34 बिलियन के आंकड़े को पार कर चुकी है।
निवेशकों के लिए, मुख्य बात यह है कि इन ऊंची जमा दरों का बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margin) पर क्या असर पड़ेगा। ये जमा राशियां स्थिर विदेशी मुद्रा लिक्विडिटी तो प्रदान करती हैं, लेकिन इनकी लागत सामान्य घरेलू बचत खातों की तुलना में अधिक होती है। शेयरधारकों को बैंकों की इन फंडों को प्रभावी ढंग से निवेश करने की क्षमता पर नजर रखनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि जमा की बढ़ी हुई लागत आगामी तिमाही नतीजों में लाभप्रदता (Profitability) को प्रभावित करती है या नहीं। स्वैप विंडो बंद होने तक उद्योग में यह गतिविधि जारी रहने की उम्मीद है, क्योंकि बैंक प्रतिस्पर्धी दरों पर लंबी अवधि के लिए विदेशी मुद्रा संसाधन सुरक्षित करना चाहते हैं।
