सरकार ने UPI ट्रांजेक्शन पर मिलने वाली सरकारी मदद यानी सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म करने का फैसला किया है। अब डिजिटल पेमेंट सेक्टर पूरी तरह से 'सेल्फ-सस्टेनेबल' यानी आत्मनिर्भर मॉडल की ओर बढ़ रहा है।
सब्सिडी से कमर्शियल मॉडल की ओर बढ़ता कदम
भारत सरकार अब सीधे तौर पर UPI और RuPay ट्रांजेक्शन पर सब्सिडी देने की बजाय एक ऐसे मॉडल की ओर शिफ्ट हो रही है, जहां कंपनियां प्रोसेसिंग फीस से अपना रेवेन्यू कमाएंगी। शुरुआत में जब डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देना था, तब सरकार बैंकों और पेमेंट प्रोवाइडर्स को इंफ्रास्ट्रक्चर लागत कवर करने के लिए सब्सिडी देती थी, लेकिन अब यह दौर बदलने वाला है।
आंकड़ों में आई भारी गिरावट
सरकारी खर्च में यह कटौती साफ देखी जा सकती है। FY24 में जहां सब्सिडी का आंकड़ा ₹3,631 करोड़ था, वहीं FY25 में यह घटकर मात्र ₹1,046 करोड़ पर आ गया है। भले ही FY27 के बजट में ₹2,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है, लेकिन अप्रैल 2025 के बाद से कोई भी नई सब्सिडी पेमेंट प्रोसेस नहीं की गई है। यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार अब डिजिटल पेमेंट सिस्टम को मैच्योर मान रही है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों के लिए यह एक बड़ा बदलाव है। अब बैंक और फिनटेक कंपनियों को अपनी कमाई के लिए सरकार पर निर्भर न रहकर, बड़े मर्चेंट्स से मिलने वाले 'मर्चेंट डिस्काउंट रेट' (MDR) या अन्य सर्विस फीस पर ध्यान देना होगा। अब मुनाफा कमाने की जिम्मेदारी पूरी तरह से प्राइवेट सेक्टर की होगी।
चुनौतियां और जोखिम
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या मर्चेंट्स बिना किसी हिचकिचाहट के ट्रांजेक्शन फीस देने के लिए तैयार होंगे? अगर फीस बहुत ज्यादा बढ़ी, तो छोटे दुकानदार डिजिटल पेमेंट लेने से कतरा सकते हैं, जिससे ट्रांजेक्शन ग्रोथ की रफ्तार धीमी होने का रिस्क बना हुआ है। अब बाजार की नजरें इस बात पर हैं कि कंपनियां किस तरह से फीस स्ट्रक्चर सेट करती हैं ताकि उनकी कमाई भी हो और नेटवर्क की पहुंच (Reach) भी प्रभावित न हो।
