UPI पर लग सकती है फीस! सरकार ने बदला कानून, बड़े ट्रांजैक्शन पर लग सकता है MDR

BANKINGFINANCE
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
UPI पर लग सकती है फीस! सरकार ने बदला कानून, बड़े ट्रांजैक्शन पर लग सकता है MDR

सरकार ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में बदलाव कर दिया है। इससे UPI ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) फीस लेने का कानूनी रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, सरकार ने साफ किया है कि आम ग्राहकों और छोटे व्यापारियों के लिए UPI हमेशा की तरह फ्री रहेगा।

UPI ट्रांजैक्शन पर शुल्क का नया नियम

केंद्र सरकार ने एक बड़ा कानूनी कदम उठाते हुए पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में संशोधन किया है। इस बदलाव के साथ, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) फीस लगाने से लगी कानूनी रोक हट गई है। हालांकि, यह समझना ज़रूरी है कि यह केवल एक 'इनेबलिंग प्रोविज़न' है, जिसका मतलब है कि भविष्य में फीस लेने का कानूनी ढांचा तैयार किया गया है, न कि अभी तुरंत कोई फीस लागू की जा रही है। सरकार ने पहले भी स्पष्ट किया है कि आम उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों के लिए UPI हमेशा की तरह मुफ्त रहेगा।

क्यों लाया गया यह बदलाव?

UPI इकोसिस्टम पिछले छह सालों से जीरो-MDR पॉलिसी पर चल रहा था, जिसमें बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स को मर्चेंट्स से UPI पेमेंट प्रोसेस करने के लिए कोई फीस लेने की इजाज़त नहीं थी। इस बाधा को हटाकर, सरकार ने भविष्य में कुछ खास तरह के ट्रांजैक्शन पर फीस लेने का विकल्प खोल दिया है। इसका मुख्य उद्देश्य डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने की लागत को पूरा करना है, साथ ही आम लोगों और छोटे दुकानदारों को किसी भी अतिरिक्त शुल्क से बचाना है।

क्या है चिंता का विषय?

संसद की स्थायी समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार, UPI नेटवर्क के रखरखाव की सालाना लागत लगभग ₹20,700 करोड़ आंकी गई है, जो सिस्टम को सपोर्ट करने के लिए मिलने वाले सरकारी बजट से काफी ज्यादा है। उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि जीरो-फी मॉडल बैंकों और पेमेंट ऐप्स पर भारी बोझ डालता है, खासकर साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी की रोकथाम और सिस्टम अपग्रेड जैसे कामों के लिए। जैसे-जैसे ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़ रही है, इन क्षेत्रों में लगातार निवेश की ज़रूरत बढ़ती जा रही है।

क्या होगा आम आदमी पर असर?

अभी जो प्रस्ताव विचाराधीन है, उसके मुताबिक ₹2,000 से बड़े पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन पर 0.3% से 0.5% तक की MDR फीस लग सकती है, और वह भी सिर्फ बड़े व्यापारियों पर। पिछले फाइनेंशियल ईयर के आंकड़े बताते हैं कि अरबों UPI ट्रांजैक्शन में से ज़्यादातर पर्सन-टू-पर्सन (P2P) हैं, जिन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन में भी, केवल लगभग 4% ट्रांजैक्शन ही ₹2,000 की सीमा से ऊपर होते हैं।

आगे चलकर, नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और संबंधित कमेटियां ही फीस के ढांचे, दायरे और लागू होने की समय-सीमा तय करेंगी। निवेशक और बाज़ार पर नज़र रखने वाले इस बात पर ध्यान देंगे कि यह नियम कैसे बैंकों और फिनटेक कंपनियों के बीच रेवेन्यू बांटेगा। किसी भी अंतिम कार्यान्वयन को धीरे-धीरे और इस तरह से किया जाएगा कि डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम मजबूत और सुरक्षित बना रहे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.