Goldman Sachs के एनालिस्ट्स का मानना है कि भारतीय बाजारों से विदेशी निवेशकों की बिकवाली अब थम गई है। उन्होंने Nifty 50 के लिए जून 2027 तक **26,500** का लक्ष्य रखा है। फर्म का कहना है कि ग्लोबल फंड्स का हल्का निवेश और घरेलू इकोनॉमी में सुधार FII इनफ्लो को बढ़ावा दे सकते हैं।
FII की वापसी के संकेत!
ग्लोबल ब्रोकरेज हाउस Goldman Sachs ने भारतीय इक्विटी मार्केट को लेकर अपना नज़रिया बदला है। फर्म का कहना है कि 2026 की पहली छमाही में जो विदेशी बिकवाली (FII Outflow) देखी गई थी, वह अब खत्म हो चुकी है। जुलाई 2026 की एक रिपोर्ट में एनालिस्ट्स ने कहा है कि भारतीय इकोनॉमी में सुधार और ग्लोबल फंड्स द्वारा भारतीय स्टॉक्स में ऐतिहासिक रूप से कम निवेश के चलते फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) मार्केट में वापस आ सकते हैं।
Nifty 50 के लिए बड़ा लक्ष्य!
पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद, Goldman Sachs ने Nifty 50 इंडेक्स के लिए जून 2027 तक 26,500 का लक्ष्य रखा है। यह मौजूदा स्तरों से करीब 10% की बढ़त का संकेत देता है। यह मई 2026 के मुकाबले एक बड़ा बदलाव है, जब फर्म ने वैल्यूएशन (Valuation) और नॉर्थ एशियन मार्केट्स की तुलना में सीमित ग्रोथ की चिंताओं के कारण सतर्क रुख अपनाया था। 2026 के शुरुआती 3.5 महीनों में ग्लोबल इन्वेस्टर्स ने भारत से करीब $30 बिलियन निकाले थे, लेकिन हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि जून के मध्य से करीब $2 बिलियन का इनफ्लो हुआ है, खासकर फाइनेंशियल सेक्टर में।
वैल्यू स्टॉक्स पर फोकस!
Goldman Sachs को उम्मीद है कि इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी 'ग्रोथ' से 'वैल्यू' की ओर शिफ्ट होगी, क्योंकि इन्वेस्टर्स वाजिब दामों वाले स्टॉक्स की तलाश करेंगे। फर्म ने बताया कि दो-तीन साल में पहली बार इतने स्टॉक्स उचित वैल्यूएशन पर मिल रहे हैं। लार्ज-कैप स्टॉक्स अब ज्यादा आकर्षक लग रहे हैं क्योंकि उनका वैल्यूएशन 15 साल के ऐतिहासिक औसत के करीब आ गया है, जबकि मिड-कैप स्टॉक्स अभी भी अपने लॉन्ग-टर्म एवरेज से प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं।
पसंदीदा सेक्टर्स और जोखिम!
सेक्टर की बात करें तो, फर्म बैंकों, टूरिज्म और डिफेंस को पसंद कर रही है। पावर यूटिलिटीज को 'ओवरवेट' (Overweight) किया गया है, जो संभावित पावर शॉर्टेज और वैल्यू-बेस्ड इन्वेस्टमेंट की ओर झुकाव को दर्शाता है। वहीं, मेटल्स, माइनिंग और सीमेंट पर फर्म 'अंडरवेट' (Underweight) बनी हुई है, जिसका कारण मॉनसून का मौसमी दबाव और बढ़ती कमोडिटी कॉस्ट है। IT और फार्मा सेक्टर के एक्सपोर्टर्स, साथ ही ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर भी फिलहाल सावधानी बरतने की सलाह है।
आगे क्या?
हालांकि आउटलुक पॉजिटिव हो गया है, लेकिन फर्म ने आगाह किया है कि चुनौतियां बनी हुई हैं। इन्वेस्टर्स अभी भी अर्निंग्स में गिरावट (Earnings Downgrades) के चक्र और भारत के वैल्यूएशन-टू-ग्रोथ मिक्स को लेकर चिंतित हैं। किसी भी फॉरेन इनफ्लो का असली फायदा घरेलू इकोनॉमिक रिकवरी की मजबूती पर निर्भर करेगा, जो इन्वेस्टर सेंटिमेंट को बनाए रखने का मुख्य फैक्टर है। निवेशकों को आने वाली कॉर्पोरेट अर्निंग्स और मैक्रोइकॉनोमिक डेटा पर नजर रखनी चाहिए कि क्या घरेलू विजिबिलिटी में अपेक्षित सुधार होता है, क्योंकि ये फैक्टर्स तय करेंगे कि ग्लोबल फंड्स भारतीय बाजार में अपनी अंडरवेट पोजीशन को कितना सामान्य करते हैं।
