Gold Loans: ₹5.1 लाख करोड़ के पार पहुंचा गोल्ड लोन का बिज़नेस, NBFCs पर क्या होगा असर?

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AuthorAditya Rao|Published at:
Gold Loans: ₹5.1 लाख करोड़ के पार पहुंचा गोल्ड लोन का बिज़नेस, NBFCs पर क्या होगा असर?

भारत में गोल्ड लोन (Gold Loans) का कारोबार पिछले एक साल में दोगुना से भी ज़्यादा हो गया है। मई 2026 तक यह **₹5.1 लाख करोड़** के आंकड़े को पार कर गया है। हाउसिंग लोन (Housing Loan) में नरमी के बीच यह उछाल बाकी रिटेल लोन सेगमेंट से कहीं ज़्यादा तेज़ है। अब सवाल यह है कि इस बदलाव का खास गोल्ड लोन NBFCs और बैंकों के प्रॉफिट मार्जिन पर क्या असर पड़ेगा, साथ ही गोल्ड की कीमतों में उतार-चढ़ाव से जुड़े रेगुलेटरी जोखिम (Regulatory Risks) क्या हैं।

क्या हुआ है?

सोने के गहनों पर दिए जाने वाले लोन (Gold Jewelry Loans) में पिछले एक साल में 105.5% की ज़बरदस्त ग्रोथ देखने को मिली है। 31 मई 2026 तक कुल गोल्ड लोन का आंकड़ा ₹5.1 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। यह ग्रोथ पर्सनल लोन (Personal Loan) के बड़े सेगमेंट की तुलना में कहीं ज़्यादा है, जो महज़ 15.4% बढ़कर ₹70.2 लाख करोड़ हुआ है। वहीं, होम लोन जैसे ट्रेडिशनल रिटेल लोन में ग्रोथ धीमी होकर 10.9% पर आ गई है। गोल्ड-बैक्ड क्रेडिट (Gold-backed Credit) तेज़ी से अपनी पैठ बना रहा है। अब कुल पर्सनल लोन पोर्टफोलियो का 7.3% हिस्सा गोल्ड लोन का है, जो 2024 में सिर्फ़ 1.97% और 2025 में 4.1% था।

डिमांड में बदलाव क्यों?

क्रेडिट पोर्टफोलियो में यह बदलाव दिखाता है कि भारतीय परिवार अब लिक्विडिटी (Liquidity) के लिए गोल्ड की ओर रुख कर रहे हैं। हाउसिंग लोन की ग्रोथ में कमी और कंज्यूमर ड्यूरेबल (Consumer Durables) जैसे सेगमेंट में गिरावट को देखते हुए, लोग अपनी तात्कालिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए गोल्ड जैसे आसानी से मिलने वाले और लिक्विड एसेट (Liquid Asset) का सहारा ले रहे हैं। इसके अलावा, सर्विस सेक्टर (Services Sector) में 20.4% की मज़बूत क्रेडिट ग्रोथ देखी गई है, जिसमें नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (NBFCs) को बैंकों से मिलने वाले 33.7% ज़्यादा फाइनेंस का बड़ा योगदान है। इसका मतलब है कि बैंक, NBFCs के ज़रिए कैपिटल (Capital) पहुंचा रहे हैं, जिनके पास अक्सर गोल्ड लोन स्पेस में मज़बूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क (Distribution Network) होता है।

लेंडर्स और मार्जिन पर असर

लोन देने वाली कंपनियों के लिए, गोल्ड लोन आम तौर पर होम लोन जैसे ट्रेडिशनल सिक्योर लोन (Secured Loans) की तुलना में हाई-यील्ड (High-yield) प्रोडक्ट माने जाते हैं। हालांकि, इस सेगमेंट की प्रॉफिटेबिलिटी (Profitability) काफी हद तक फंड की लागत (Cost of Funds) और ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiency) पर निर्भर करती है। जो NBFCs गोल्ड लोन में स्पेशलाइज़्ड (Specialized) हैं, जैसे कि Muthoot Finance और Manappuram Finance, वे अक्सर अपनी उधार लेने की ज़्यादा लागत को कवर करने वाले स्प्रेड (Spread) के साथ काम करती हैं। वॉल्यूम ग्रोथ (Volume Growth) रेवेन्यू (Revenue) के लिए अच्छी है, लेकिन निवेशकों को यह देखना चाहिए कि बैंकों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा (Competition) कहीं यील्ड (Yield) को कम न कर दे या आक्रामक लेंडिंग प्रैक्टिस (Aggressive Lending Practices) को बढ़ावा न दे।

जोखिम और रेगुलेटरी पहलू

हालांकि ग्रोथ काफ़ी बड़ी है, लेकिन इसमें कुछ खास जोखिम भी हैं जिन पर निवेशकों को नज़र रखनी चाहिए। गोल्ड लोन सीधे तौर पर मेटल की बाज़ार कीमत (Market Price) से जुड़े होते हैं। अगर सोने की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव आता है, तो लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेशियो (लोन की रकम का गोल्ड वैल्यू से प्रतिशत) में बदलाव आ सकता है, जिससे डिफ़ॉल्ट (Default) का जोखिम बढ़ सकता है या कोलैटरल (Collateral) टॉप-अप की ज़रूरत पड़ सकती है। इसके अलावा, बैंकिंग रेगुलेटर (Banking Regulator) ऐतिहासिक रूप से गोल्ड लोन की प्रैक्टिस पर कड़ी नज़र रखता है, खासकर वैल्यूएशन नॉर्म्स (Valuation Norms) और डिफ़ॉल्ट गोल्ड जूलरी की नीलामी (Auction) की प्रक्रियाओं को लेकर। रेगुलेटरी नियमों में कोई भी सख्ती या वैल्यूएशन ज़रूरतों में बदलाव, NBFCs के इनकम रिकग्निशन (Income Recognition) या उनके लोन बुक (Loan Book) को मैनेज करने के तरीके को प्रभावित कर सकता है।

निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?

आने वाले क्वार्टरली रिजल्ट्स (Quarterly Results) में निवेशकों को कुछ ज़रूरी इंडिकेटर्स (Indicators) पर ध्यान देना चाहिए। सबसे पहले, गोल्ड-केंद्रित लेंडर्स के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) की निगरानी करें ताकि यह पता चल सके कि प्रतिस्पर्धा लाभप्रदता (Profitability) पर दबाव डाल रही है या नहीं। दूसरा, एसेट क्वालिटी (Asset Quality) पर नज़र रखें, खास तौर पर गोल्ड की कीमतों में उतार-चढ़ाव के दौरान नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (Non-Performing Assets) की प्रतिशतता क्या है। अंत में, मैनेजमेंट की LTV पॉलिसीज़ (LTV Policies) और फंडिंग कॉस्ट (Funding Costs) पर कमेंट्री ज़रूरी होगी, क्योंकि ये कंपनियां अपने विस्तार के लिए बैंकों से मिलने वाले क्रेडिट पर निर्भर करती हैं।

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